Friday, June 8, 2012

Kamaal Hai Saaheb !


कमाल है साहब !
कमाल है साहब , की भूंख में पेट एंठने लगता है ,
आँखे भाव शून्य हो जाती हैं , और सारी सोच समझ
पूरा दर्शन शास्त्र, अच्छाई - बुराई – ठीक - गलत
मिलकर रसोईं में कुछ ढूडने लगते हैं,
कमाल है साहब की इस आलम में - प्रेमिका की भी याद नहीं आती
और ना ही याद आती हैं - सम्भोग की वो सुखद घडियां,
हर सुंदर मांसल स्त्री का बदन - फूली हूई चपातियों सा लगता है,
शाकाहारी हूँ ना शायद इसीलिए,
वेश्याओं की - खून और गुर्दा बेचने वालों की
चालाकी पर दिल खुश होता है,
भीख मांगते बच्चों के पेट में - हो रही खुजली समझ आती है
और कमाल है साहब की इस आलम में भी
अपने परम मित्र से कुछ पैसे मांगने में
झिझक महसूस होती है – शर्म सी आती है
कमाल है ना साहब ?
[ मेरी डायरी में १७/०१/९५ को लिखी गयी ]
अगस्त्य 

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