Tuesday, June 6, 2017

मनुष्य की लालसा ....

टॉल्सटॉय की प्रसिद्ध कहानी है कि एक आदमी के घर एक संन्यासी मेहमान हुआ- एक परिव्राजक। रात गपशप होने लगी, उस परिव्राजक ने कहा कि तुम यहाँ क्या छोटी-मोटी खेती में लगे हो। साइबेरिया में मैं यात्रा पर था तो वहाँ जमीन इतनी सस्ती है मुफ्त ही मिलती है। तुम यह जमीन छोड़-छाड़कर, बेच-बाचकर साइबेरिया चले जाओ। वहाँ हजारों एकड़ जमीन मिल जाएगी इतनी जमीन में। वहाँ करो फसलें और बड़ी उपयोगी जमीन है और लोग वहाँ के इतने सीधे-सादे हैं कि करीब-करीब मुफ्त ही जमीन दे देते हैं। उस आदमी को वासना जगी। उसने दूसरे दिन ही सब बेच-बाचकर साइबेरिया की राह पकड़ी। जब पहुँचा तो उसे बात सच्ची मालूम पड़ी। उसने पूछा कि मैं जमीन खरीदना चाहता हूँ। तो उन्होंने कहा, जमीन खरीदने का तुम जितना पैसा लाए हो, रख दो; और जीवन का हमारे पास यही उपाय है बेचने का कि कल सुबह सूरज के ऊगते तुम निकल पड़ना और साँझ सूरज के डूबते तक जितनी जमीन तुम घेर सको घेर लेना।  बस चलते जाना... जितनी जमीन तुम घेर लो। साँझ सूरज के डूबते-डूबते उसी जगह पर लौट आना जहाँ से चले थे- बस यही शर्त है। जितनी जमीन तुम चल लोगे, उतनी जमीन तुम्हारी हो जाएगी। रात-भर तो सो न सका वह आदमी। तुम भी होते तो न सो सकते; ऐसे क्षणों में कोई सोता है ? रातभर योजनाएँ बनाता रहा कि कितनी जमीन घेर लूँ। सुबह ही भागा। गाँव इकट्ठा हो गया था। सुबह का सूरज ऊगा....... वह भागा। उसने साथ अपनी रोटी भी ले ली थी, पानी का भी इंतजाम कर लिया था। रास्ते में भूख लगे, प्यास लगे तो सोचा था चलते ही चलते खाना भी खा लूँगा, पानी भी पी लूँगा। रुकना नहीं है; चलना क्या है; दौड़ना है। दौड़ना शुरू किया, क्योंकि चलने से तो आधी ही जमीन कर पाऊँगा, दौड़ने से दुगनी हो सकेगी- भागा...भागा...। सोचा था कि ठीक बारह बजे लौट पड़ूँगा, ताकि सूरज डूबते-डूबते पहुँच जाऊँ। बारह बज गए, मीलों चल चुका है, मगर वासना का कोई अंत है ? उसने सोचा कि बारह तो बज गए, लौटना चाहिए; लेकिन सामने और उपजाऊ जमीन, और उपजाऊ जमीन... थोड़ी सी और घेर लूँ। जरा तेजी से दौड़ना पड़ेगा लौटते समय- इतनी ही बात है, एक ही दिन की तो बात है, और जरा तेजी से दौड़ लूँगा।  उसने पानी भी न पीया, क्योंकि रुकना पड़ेगा उतनी देर- एक दिन की ही तो बात है, फिर कल पी लेंगे पानी, फिर जीवन भर पीते रहेंगे। उस दिन उसने खाना भी न खाया। रास्ते में उसने खाना भी फेंक दिया, पानी भी फेंक दिया, क्योंकि उनका वजन भी ढोना पड़ा रहा है, इसलिए दौड़ ठीक से नहीं पा रहा है। उसने अपना कोट भी उतार दिया, अपनी टोपी भी उतार दी, जितना निर्भार हो सकता था हो गया।  एक बज गया, लेकिन लौटने का मन नहीं होता, क्योंकि आगे और-और सुंदर भूमि आती चली जाती है। मगर फिर लौटना ही पड़ा; दो बजे तक लौटा। अब घबड़ाया। सारी ताकत लगाई; लेकिन ताकत तो चुकने के करीब आ गई थी। सुबह से दौड़ रहा था, हाँफ रहा था, घबरा रहा था कि पहुँच पाऊँगा सूरज डूबते तक कि नहीं। सारी ताकत लगा दी। पागल होकर दौड़ा। सब दाँव पर लगा दिया। और सूरज डूबने लगा...। ज्यादा दूरी भी नहीं रह गई है, लोग दिखाई पड़ने लगे। गाँव के लोग खड़े हैं और आवाज दे रहे हैं कि आ जाओ, आ जाओ! उत्साह दे रहे हैं, भागे आओ! अजीब सीधे-सादे लोग हैं- सोचने लगा मन में; इनको तो सोचना चाहिए कि मैं मर ही जाऊँ, तो इनको धन भी मिल जाए और जमीन भी न जाए। मगर वे बड़ा उत्साह दे रहे हैं कि भागे आओ! उसने आखिरी दम लगा दी- भागा, भागा...। सूरज डूबने लगा; इधर सूरज डूब रहा है, उधर भाग रहा है...। सूरज डूबते-डूबते बस जाकर गिर पड़ा। कुछ पाँच-सात गज की दूरी रह गई है; घिसटने लगा।  अभी सूरज की आखिरी कोर क्षितिज पर रह गई- घिसटने लगा। और जब उसका हाथ उस जमीन के टुकड़े पर पहुँचा, जहाँ से भागा था, उस खूँटी पर, सूरज डूब गया। वहाँ सूरज डूबा, यहाँ यह आदमी भी मर गया। इतनी मेहनत कर ली! शायद हृदय कर दौरा पड़ गया। और सारे गाँव के सीधे-सादे लोग जिनको वह समझाता था, हँसने लगे और एक-दूसरे से बात करने लगे!  ये पागल आदमी आते ही जाते हैं! इस तरह के पागल लोग आते ही रहते हैं! यह कोई नई घटना न थी, अक्सर लोग आ जाते थे खबरें सुनकर, और इसी तरह मरते थे। यह कोई अपवाद नहीं था, यही नियम था। अब तक ऐसा एक भी आदमी नहीं आया था, जो घेरकर जमीन का मालिक बन पाया हो। यह कहानी तुम्हारी कहानी है, तुम्हारी जिंदगी की कहानी है, सबकी जिंदगी की कहानी है। यही तो तुम कर रहे हो- दौड़ रहे हो कि कितनी जमीन घेर लें! बारह भी बज जाते हैं, दोपहर भी आ जाती है, लौटने का भी समय होने लगता है- मगर थोड़ा और दौड़ लें! न भूख की फिक्र है, न प्यास की फिक्र है।  जीने का समय कहाँ है? पहले जमीन घेर लें, पहले जितोरी भर लें, पहले बैंक में रुपया इकट्ठा हो जाए; फिर जी लेंगे, फिर बाद में जी लेंगे, एक ही दिन का तो मामला है। और कभी कोई नहीं जी पाता। गरीब मर जाते हैं भूखे, अमीर मर जाते हैं भूखे, कभी कोई नहीं जी पाता। जीने के लिए थोड़ी विश्रांति चाहिए। जीने के लिए थोड़ी समझ चाहिए। जीवन मुफ्त नहीं मिलता- - बोध चाहिए।

From my Masters Mouth.....

Experienced Ignorant....

Wednesday, May 10, 2017

बुद्ध की मृत्यु .....

 बुद्ध एक गांव में ठहरे थे। और उस गांव के एक शुद्र ने,एक गरीब आदमी ने बुद्ध को निमंत्रण दिया की मेरे घर भोजन करो। भगवान ने उसका निमंत्रण स्‍वीकार कर लिया। सुबह-सुबह जल्‍दी आ गया था। वह जानता था उसका नम्‍बर बाद में तो नहीं आ पायेगा। इससे पहले और लोग निमंत्रण न दे वह बहुत सुबह उठ भगवान की गंध कुटी के सामने आ बैठा। उस की बड़ी तमन्‍ना थी की जीवन में एक बार भगवान उसके यहाँ भी भोजन ग्रहण करे।

वह निमंत्रण दे ही रहा था कि इतनी देर में गांव को कोई धन पति ने आकर भगवान को कहा कि आज का भोजन निमंत्रण मेरे ग्रहण करें। भगवान बुद्ध ने कहा धनपति आज का तो निमंत्रण आ चुका है। इस प्रेमी ने आज अपने घर बुलाया हे। उस अमीर ने उस आदमी की तरफ देखा और कहां, इस का निमंत्रण, शायद इस के पास तो अपने खाने के लिए भी कुछ नहीं होगा। इसके तो खुद कई-कई फाँकें पड़े होते है। तब उसने उसकी तरफ देख कर उससे पूछा क्‍या में कुछ गलत कहा रहा हूं। उस व्‍यक्‍ति ने गर्दन हिला कर हामी भर दी। इस के पास कुछ तो खिलाने के लिए होगा तभी तो यह इतनी दुर से मुझे निमंत्रण देने के लिए आया है। जो भी हो इसके पास जो भी होगा अब निमंत्रण तो इसी का स्‍वीकार कर चूका हूं। और इसी के घर भोजन करूंगा। जाओ ग्रह पति आप भोजन की तैयारी करो आज का भोजन आपके यहाँ है।

भगवान बुद्ध गये। उस आदमी को भरोसा भी न था कि भगवान उसके घर पर भी कभी भोजन ग्रहण करेने के लिए आएँगे। उसके पास कुछ भी न था खिलाने को वस्‍तुत:। वह अमीर ठीक कह रहा था। रूखी रोटिया थीं। सब्‍जी के नाम पर बिहार में गरीब किसान वह जो बरसात के दिनों में कुकुरमुत्‍ते पैदा हो जाते है—लकड़ियों पर, गंदी जगह में—उस कुकुरमुत्‍ते को इकट्ठा कर लेते है। सुखाकर रख लेते है। और उसी की सब्‍जी बनाकर खाते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि कुकुरमुत्‍ते पायजनस हो जाता है। जहरीला हो जाता है। सांप वगैरा के गुजरने के कारण। वह ऐसी जगह पैदा हो गये हो जहां जहर मिल गया। तो कुकुरमुत्‍तों में जहर था।

बुद्ध के लिए उसने कुकुरमुत्‍ते की सब्‍जी बनाई। वह एक दम कड़वे जहर थे। मुंह में रखना मुश्‍किल था। लेकिन उसके पास एक ही सब्‍जी थी। तो भगवान बुद्ध ने यह सोच कर कि अगर मैं कहूं कि यह सब्‍जी कड़वी हे। तो यह कठिनाई में पड़ेगा; उसके पास कोई दूसरी सब्‍जी नहीं है। वह उस ज़हरीली सब्‍जी को खा गये। उसे मुंह में भी रखना कठिन था। पूरी को मांग कर की बहुत सुस्‍वाद बनी है। कह कर खा गये ताकि इसे बाद में भी पता न चले कि यह ज़हरीली सब्‍जी थी। खूब आनंद ले कर खाते रहे।

जैसे ही भगवान बुद्ध वहां से निकले, उस आदमी ने जब सब्‍जी को चखा तो वह तो हैरान हो गया। यह क्‍या यह तो कड़वी जहर सब्‍जी है। वह भागा हुआ आया और उसने कहा कि आप क्‍या करते रहे? वह तो जहर है। वह छाती पीटकर कर रोने लगा। लेकिन बुद्ध भगवान ने कहा, तू जरा भी चिंता मत कर। क्‍योंकि जहर मेरा अब कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगा। क्‍योंकि मैं उसे जानता हूं जो अमृत है। तू जरा भी चिंता मत कर घर जा।

लेकिन फिर भी उस आदमी की चिंता तो हम समझ सकते है। कि उससे अनजाने में क्‍या हो गया उसे अंदरूनी तोर पर कितनी गिलानि पीड़ा पश्‍चाताप हो रहा होगा कि उसने ये कर दिया। पर उस आदमी को भगवान ने कहां तू धन्‍य भागी है। तुझे पता नहीं, तू खुश हो, तू सौभाग्‍यशाली है। क्‍योंकि कभी हजारों वर्षों में बुद्ध जैसा व्‍यक्‍ति पैदा होता है। दो ही व्‍यक्‍तियों को उसका सौभाग्‍य मिलता हे। पहला भोजन कराने का अवसर उसकी मां को मिलता है और अंतिम भोजन कराने का अवसर तुझे मिला है। तू सौभाग्‍यशाली है; तू आनंदित हो। ऐसा फिर सैकड़ों हजारों वर्षों में कभी कोई बुद्ध पैदा होगा और ऐसा अवसर फिर किसी को मिलेगा। उस आदमी को किसी तरह समझा-बूझकर लौटा दिया।

बुद्ध के शिष्‍यों ने जीवन वैद्य को बुला कर जब पता कराया की भगवान की तबीयत क्‍यों खराब रहती है। तब उसने बताया कि इन्‍हें जहर दिया गया है। तब भगवान के अन्‍य भिक्षुओं के साथ आनंद रोने लगा। की वह आदमी तो हत्‍यारा है, उसने आपको जहर दिया है। भगवान ने कहा: ऐसी बात भूल कर भी मत कहना। अन्‍यथा उस आदमी को कोई जीवित नहीं रहने देगा। आनंद तुम गांव में लोगों को भेज कर यह डोंडी पिटवां दो ये खबर करवा दो की दो ही आदमी परम सौभाग्‍यशाली होते है, जिसने पहला भोजन बुद्ध को कराया और जिसने अंतिम भोजन बुद्ध को कराया।

मरने के वक्‍त तक सब लोग यही कहते रहे की आप एक बार तो कहा देते की यह सब्‍जी कड़वी है विषाक्‍त है। तब हम पर यह वज्रपात अकस्‍मात न गिरता। आपने भी यह क्‍या किया। और भगवान केवल मुस्कुराए और कहने लगे जानते है। यह तो निमित है कैसे जाना कोई तो बहाना होना ही था। यह वज्रपात गिरना तो था ही, इससे क्‍या फर्क पड़ता है कैसे गिरा। जहां तक मेरा संबंध है मुझ पर कोई वज्रपात नहीं गिरा क्‍योंकि मैने उसे जान लिया है जो अमृत हे। जिसकी कोई मृत्‍यु नहीं होती।

   अनूभवी अज्ञानी .....

Saturday, April 8, 2017

प्रतिस्पर्धा की पढ़ाई , Education of Competition....


अतीत में जो शिक्षा प्रचलित थी वह पर्याप्त नहीं है, अधूरी है, सतही है। वह सिर्फ ऐसे लोग निर्मित करती है जो रोजी-रोटी कमा सकते हैं लेकिन जीवन के लिए वह कोई अंतर्दृष्टि नहीं देती। वह न केवल अधूरी है, बल्कि घातक भी है क्योंकि वह प्रतिस्पर्धा पर आधारित है। 

किसी भी प्रकार की प्रतिस्पर्धा, गहरे में हिंसक होती है और प्रेम-रहित लोगों को पैदा करती है। उनका पूरा प्रयास होता है, जीवन में कुछ पाना है - नाम,कीर्ति, सब तरह की महत्वाकांक्षाएं। स्वभावतः, उन्हें लड़ना पड़ता है और उसके लिए संघर्षरत रहना पड़ता है। उससे उनका आनंद और उनका मैत्री-भाव खो जाता है। लगता है, जैसे हर व्यक्ति पूरे विश्व के साथ लड़ रहा है। 

शिक्षा अब तक लक्ष्य की ओर उन्मुख रही है। तुम क्या सीख रहे हो यह महत्वपूर्ण नहीं है; साल, दो साल बाद जो परीक्षा होगी वह महत्वपूर्ण है। वह भविष्य को महत्वपूर्ण बनाती है-वर्तमान से अधिक महत्वपूर्ण। वह भविष्य के लिए वर्तमान की बलि चढ़ाती है। और यह तुम्हारी जीवन-शैली बन जाती है। तुम हमेशा इस क्षण को उसके लिए समर्पित करते हो, जो अभी मौजूद नहीं है। उससे जीवन में गहन रिक्तता पैदा होती है। 

मेरी दृष्टि में जो कम्यून है, उसमें शिक्षा के पांच आयाम होंगे। 

इससे पहले कि मैं उन पांचों आयामों की चर्चा करुँ, कुछ बातें खयाल में ले लेनी चाहिए। एक, शिक्षा के अंग की भांति कोई भी परीक्षा नहीं होनी चाहिए। लेकिन प्रतिदिन, प्रत्येक घंटे में शिक्षक निरीक्षण करे; और पूरे वर्ष के दौरान उन्होंने जो टिप्पणी लिखी होगी उससे निर्धारित होगा कि तुम आगे बढ़ोगे या उसी कक्षा में कुछ समय तक रहोगे। न कोई अनुत्तीर्ण होगा, न कोई उत्तीर्ण होगा। फर्क इतना ही होगा कि कुछ लोगों की गति ज्यादा होगी, कुछ लोगों की थोड़ी कम होगी। असफलता का खयाल हीनता का गहरा घाव पैदा करता है, और सफल होने का खयाल भी एक अलग तरह की बीमारी पैदा करता है: श्रेष्ठता का भाव। 

न कोई निकृष्ट है, न कोई श्रेष्ठ है। 
व्यक्ति सिर्फ स्वयं है-अतुलनीय। 

इसलिए परीक्षाओं की कोई जगह न होगी। इससे पूरा परिप्रेक्ष्य ही बदल कर भविष्य से वर्तमान में आ जाएगा। तुम इस क्षण जो ठीक से कर रहे हो वह निर्णायक होगा, साल के अंत में पूछे जाने वाले पांच सवाल नहीं। इन दो वर्षों में तुम जिन हजारों चीजों से गुजरोगे, वह हर चीज निर्णायक होगी। तो शिक्षा लक्ष्य केंद्रित नहीं होगी। 

अतीत में शिक्षक अत्यंत महत्वपूर्ण था; क्योंकि उसे पता था कि वह सब परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो चुका है। उसने ज्ञान का संग्रह कर लिया था। लेकिन वह परिस्थिति अब बदल गई है। लेकिन समस्या यह है कि परिस्थिति बदल जाती है और उसके प्रति हमारे प्रतिसंवेदन पुराने ही रह जाते हैं। अब ज्ञान का विस्फोट इतना अधिक हो गया है, इतना विराट और इतना तेज हुआ है कि तुम किसी वैज्ञानिक विषय पर बड़ी किताब नहीं लिख सकते क्योंकि जब तक तुम्हारी किताब पूरी होगी तब तक वह तिथि बाह्य हो चुकी होगी। नये तथ्य, नये आविष्कार उसे असंगत कर देंगे। तो अब विज्ञान को लेखों पर, पत्रिकाओं पर निर्भर रहना पड़ता है, किताबों पर नहीं। 

शिक्षक ने तीस साल पहले शिक्षा पाई थी। तीस सालों में सब कुछ बदल गया और वह वही दोहराता रहता है, जो उसने तीस साल पहले सीखा था। वह तिथिबाह्य हो गया है और वह अपने विद्यार्थियों को तिथिबाह्य बना रहा है। मेरी दृष्टि में शिक्षक के लिए कोई जगह नहीं है। शिक्षकों की बजाय मार्गदर्शक होंगे। इस फर्क को समझ लेना जरूरी है। मार्गदर्शक तुम्हें यह बताएगा कि पुस्तकालय में इस विषय पर नवीनतम जानकारी कहां मिल सकती है। 

भविष्य में कंप्यूटर अत्यधिक, क्रांतिकारी रूप से महत्वपूर्ण सिद्ध होने वाला है। 

उदाहरण के लिए, विद्यार्थियों को जिस तरह से शिक्षा दी जाती है वह बिलकुल ही पुरातनपंथी है। अभी भी वह स्मृति को पुष्ट करने पर निर्भर करता है। और स्मृति पर जितना बोझ डाला जाए उतनी ही स्पष्टता और बुद्धिमत्ता की संभावना कम हो जाती है। मैं इसे एक बहुत बड़ा अवसर मानता हूं कि सब तरह की जानकारी का संग्रह करने से विद्यार्थियों को मुक्ति मिल सकती है। वे अपने साथ छोटे कंप्यूटर रख सकते हैं जिनमें उनके जरूरत की सभी जानकारी होगी। उससे उनके मस्तिष्क को अधिक ध्यानपूर्ण, सुस्पष्ट और निश्चल होने में मदद मिलेगी। अभी तो उनके मस्तिष्क में व्यर्थ का कूड़ा-करकट भरा रहता है। 

भविष्य में शिक्षा कंप्यूटर और टेलीविज़न पर ही केंद्रित होगी क्योंकि पढ़ा हुआ या सुना हुआ इतनी सरलता से खयाल में नहीं रहता जितना कि देखा हुआ। कान या अन्य किसी भी साधनों की अपेक्षा आंखें कहीं अधिक शक्तिशाली माध्यम हैं। और पढ़ने या सुनने में जो ऊब पैदा होती है वह भी उसमें नहीं होती। उलटे टेलीविज़न एक आनंदपूर्ण अनुभव बन जाता है। भूगोल बड़े रंगीन ढंग से पढ़ाया जा सकता है। 

शिक्षक केवल एक मार्गदर्शक होगा, जो तुम्हें उचित चैनल दिखा देगा, तुम्हें कंप्यूटर का उपयोग करना सिखा देगा, और यह भी दिखा देगा कि नवीनतम किताब को कैसे खोजना। उसका काम बिलकुल ही भिन्न होगा। वह तुम्हें ज्ञान नहीं दे रहा है, वह तुम्हें समकालीन ज्ञान के प्रति सजग कर रहा है। वह केवल मार्गदर्शक है। 

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए, मैं शिक्षा को पांच आयामों में बाँटता हूं। 

पहला आयाम है सूचनात्मक, जैसे इतिहास, भूगोल और इस तरह के बहुत से विषय जिन्हें टेलीविज़न और कंप्यूटर द्वारा एक साथ पढ़ाया जा सकता है। 

लेकिन इतिहास के संबंध में हमें एक आत्यंतिक मूलभूत दृष्टिकोण लेना पड़ेगा। अभी तो चंगीज खान, तैमूरलंग, नादिरशाह, एडोल्फ हिटलर इत्यादि लोगों से इतिहास बना है। ये हमारा इतिहास नहीं है, ये हमारे दुः स्वप्न हैं। आदमी, आदमी के साथ इतना क्रूर हो सकता है यह खयाल ही जुगुप्सा पैदा करता है। हमारे बच्चों के भीतर ऐसे खयालात नहीं डाले जाने चाहिए। 

भविष्य में इतिहास के पन्ने केवल उन लोगों से भरे हुए होने चाहिए जिन्होंने इस ग्रह के सौंदर्य को बढ़ाने में योगदान दिया है-गौतम बुद्ध, सुक़रात, लाओत्सु, जलालुद्दीन रूमी, जे. कृष्णमूर्ति जैसे महान रहस्यवादी; वाल्ट व्हिटमन, उमर खय्याम जैसे श्रेष्ठ कवि लीयो टाल्सटाय, मौक्सिम गोर्की, फ्योदोर दोस्तोवस्की, रवींद्रनाथ टैगोर, बाशो जैसे महान साहित्यकार। 

हम अपनी विरासत की विधायक भव्यता की शिक्षा दें। और जो लोग अब तक ऐतिहासिक दृष्टि से महान माने गए हैं - एडोल्फ हिटलर जैसे लोग, उनका उल्लेख केवल टिप्पणियों में हो। उनका स्थान सिर्फ टिप्पणियों में होगा या परिशिष्ट में, जिसके साथ यह साफ स्पष्टीकरण हो कि या तो वे विक्षिप्त थे, या हीनता ग्रन्थि या अन्य किसी मानसिक विकार से पीड़ित थे। 

हमें आने वाली पीढ़ियों को इस बात से अवगत करा देना चाहिए कि अतीत में हमारा एक अंधेरा पहलू रहा है जो पूरे अतीत पर हावी रहा है, लेकिन अब उस पहलू के लिए कोई जगह नहीं है। 

पहले आयाम में भाषाएं भी सम्मिलित हैं। संसार के प्रत्येक व्यक्ति को दो भाषाएं तो सीखनी ही चाहिए: एक उसकी मातृभाषा और दूसरी अंग्रेजी, जो कि अंतर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान की भाषा है। इन भाषाओं को टेलीविज़न के माध्यम से बिलकुल सही ढंग से सिखाया जा सकता है-बोलने का अंदाज, व्याकरण, हर चीज आदमी से अधिक सही ढंग से सिखाई जा सकती है। 

हम विश्व में एक बंधुता का वातावरण तैयार कर सकते हैं। भाषा लोगों को जोड़ती है और भाषा तोड़ती भी है। इस समय अंतर्राष्ट्रीय भाषा एक भी नहीं है। इसके लिए हमारे पूर्वग्रह जिम्मेवार हैं। अंग्रेजी में पूरी क्षमता है क्योंकि विश्व भर में बहुत बड़े पैमाने पर ज्यादा लोग इसे जानते हैं। 

दूसरा आयाम: वैज्ञानिक विषयों की खोज। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वास्तविकता का आधा अंग है, बाह्य वास्तविकता का। वे भी टेलीविज़न और कंप्यूटर द्वारा सिखाए जा सकते हैं, परंतु वे अधिक जटिल हैं इसलिए मानव-मार्गदर्शक की ज्यादा जरूरत होगी। 

और तीसरा आयाम वह होगा जिसकी आज की शिक्षा में कमी है: जीने की कला। लोग यह माने बैठे हैं कि वे प्रेम जानते हैं। वे नहीं जानते; और जब तक वे जानने लगते हैं, बहुत देर हो चुकी होती है। प्रत्येक बच्चे को सिखाया जाए कि उसके क्रोध, घृणा, ईर्ष्या को प्रेम में कैसे रूपांतरित किया जाए। 

तीसरे आयाम का एक महत्वपूर्ण अंग होगा, हास्य-व्यंग की समझ। 

हमारी तथाकथित शिक्षा लोगों को उदास और गंभीर बनाती है। और अगर तुम्हारे जीवन का एक तिहाई हिस्सा विश्वविद्यालय में उदास और गंभीर होने में व्यतीत हो जाए तो वह तुम्हारे भीतर गहरा खुद जाता है, तुम हंसी की भाषा भूल जाते हो। और जो आदमी हंसी की भाषा भूल जाता है वह जीवन का बहुत कुछ भूल जाता है। 

तो प्रेम, हंसी और जीवन, जीवन के आश्चर्य और रहस्यों से परिचय...वृक्षों पर चहकते हुए इन पक्षियों का संगीत अनसुना न रह जाए। इन वृक्षों, फूलों और सितारों का तुम्हारे हृदय के साथ कोई नाता जुड़ना चाहिए। ये सूर्योदय और सूर्यास्त महज बाह्य घटनाएं नहीं होनी चाहिए,वे कुछ आंतरिक भी हों। जीवन के प्रति आदर, तीसरे आयाम की बुनियाद होनी चाहिए। लोग जीवन के प्रति इतने अनादर से भरे हैं। 

चौथा आयाम होना चाहिए, कला और सृजनात्मकता: चित्रकला, संगीत, हस्तकला, कविता, पत्थर तोड़ने का काम-जो भी सृजनात्मक है, वह सब। 

सृजनात्मकता के सब क्षेत्रों से उन्हें अवगत कराना चाहिए। फिर विद्यार्थी चुनाव कर सकते हैं। सिर्फ कुछ ही बातें आवश्यक होनी चाहिए-जैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा का ज्ञान आवश्यक होना चाहिए, तुम्हारी आजीविका कमाने की क्षमता आवश्यक होनी चाहिए, कोई भी एक सृजनात्मक कला आवश्यक होनी चाहिए। सृजनात्मक कलाओं के पूरे इंद्रधनुष में से तुम चुन सकते हो। क्योंकि जब तक आदमी सृजन की कला नहीं जानता, तब तक वह अस्तित्व का अंश नहीं बनता, जो कि सतत सृजन कर रहा है। सृजनात्मक होने से आदमी दिव्यता को उपलब्ध हो जाता है। सृजनात्मकता एकमात्र प्रार्थना है। 

और पाँचवाँ आयाम होगा, मरने की कला। 

इस पाँचवें आयाम में ध्यान की सब विधियां होंगी ताकि तुम जान सको कि मृत्यु होती ही नहीं; ताकि तुम अपने भीतर के शाश्वत जीवन से परिचित हो जाओ। इसे अत्यंत आवश्यक किया जाना चाहिए क्योंकि हर व्यक्ति को मरना है, इससे कोई भी बच नहीं सकता। और ध्यान के विशाल छाते के नीचे तुम्हें झेन, ताओ, योग, हसीद धर्म-सभी तरह की संभावनाएं जो आज तक रही है, उनसे परिचित कराया जा सकता है। और आज तक शिक्षा ने इसकी फिक्र नहीं की है। 

नये कम्यून में पूरी शिक्षा होगी, संपूर्ण शिक्षा होगी। 

मैं खुद एक प्राध्यापक रहा हूं। और मैंने विश्वविद्यालय से यह कह कर इस्तीफा दिया कि यह शिक्षा नहीं है, यह निपट मूढ़ता है। तुम कुछ भी अर्थपूर्ण नहीं सिखा रहे हो। 

लेकिन सारे संसार में यही निरर्थक शिक्षा प्रचलित है। फिर वह सोवियत संघ हो कि अमरीका हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; किसी ने अधिक संपूर्ण, अधिक समग्र शिक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया है। इस अर्थ में करीब-करीब हर व्यक्ति जीवन के बृहत्तर क्षेत्र में अशिक्षित है। कुछ लोग ज्यादा अशिक्षित हैं, कुछ लोग कम; लेकिन हर कोई अशिक्षित है। सुशिक्षित आदमी मिलना असंभव है क्योंकि संपूर्ण शिक्षा नाम की कोई चीज ही नहीं है।

From my Master's Mouth....

Experienced Ignorant...