Saturday, June 9, 2012

त्वदीयं वस्तु गोविन्दम – तूभ्ह्य्मेव समर्पया !

कितनी मंज़िलें मेरे आस पास होती,
ये बेवकूफ धरती ग़र घूमती न होती,
अक्ल मेँ भूसा भरा वो आदमी है कीमती,
वरना जुगाली करने को बुध्ही हमेशा रोती,
गन्दे मैले कागज़ों को थूक लगा के गिनता,
नोटोँ की गड्डी फिर भी कभी रद्दी नहीं होती,
हर मज़हब का हर देवता मेरे काम तो आया मग़र,
आजकल उतनी यँहा चढ़ोत्तरी नहीं होती,
घास चरते रहने का अपना अलग ही आनन्द है,
हम गधों की रेस में कभी जूताई नहीं होती,
मालिक ने मेरे माथे पे ये क्या लिख के भेजा,
इस भाषा की कहीं कोई पढ़ाई नहीं होती,
जी चाहता है हम भी करें दान पुण्य ऐ दोस्त,
काश मेरे दिल ने भी कूछ कमाई की होती !


त्वदीयं वस्तु गोविन्दम – तूभ्ह्य्मेव समर्पया !

तेरी नदिया - तेरी कश्ती - तू मांझी - तू ही सवार
लहरे तेरी भंवर भी तू – तू ही किनारा तू मंझधार
नाले तेरे - सीवर भी तू – तू ही नगर निगम प्रदेश सरकार
नेता तेरे - मंत्री तेरे – तू ही दलाल तू ही भ्रष्टाचार
जंगल तेरे - पेड़ भी तू – तू डाल पात और घास पतवार
लकड़हारा तू - आरा भी तू – तू ही सीसम सागोन का कारोबार
आना तू - पाई भी तू – तू ही रूपया डालर और दिनार
मालिक भी तू सेवक भी तू – तू खुद को खुद बाटे है पगार
बुद्धि तू - बुद्धि में तू – बुद्धि से उपजा तू निराकार
कंही बुद्ध कंही जीसस है तू कंही हिटलर कंही नादिरशाह की तलवार
तू दाल और रोटी - नान परांठे - तू किस्म किस्म का मांसाहार
कंही भूख से तू मर जाता है - कंही लंबी लेता है तू डकार
पेरिस तू - न्यूयार्क भी तू – तू ही कालाहांडी और बिहार
हिरोशिमा नागासाकी तू – तू ही काबूल और तू ही कंधार
तू रिक्शा खींचे - रेहड़ी लगाये - तू ठुल्लों से खाए फटकार
नेता तू - अफसर भी तू – तू ही साहेब खूब करे व्यापार
कण कण में जब तू ही तू – तो मैं भी तू और तू मैं यार
ये कलम भी तू - कागज़ भी तू – खुद को खुद लिखता नानाप्रकार !