जब भी कोई मछर काटता है तो एहसास होता है की अभी हम उस खाद्य श्रंखला
से उतना ऊपर नहीं हैं जितना की हम अपने को समझते हैं !
agastya
Thursday, November 22, 2012
Thursday, June 21, 2012
Sunday, June 17, 2012
About me !
About me
Lotus; a flower,
said to grow in dirty waters,
is but blissfull to the eye.
No one knows,Perhaps,
that spirits n springs of joy,
are its nutrition,
and its roots lie elsewhere,
in the dreams for pastures of green;.
of the beholders eyes,
God has blessed the lotus,
to seek its nutrition and its growth,
from that dreamer and the deliverer of
beauty whose eyes want to see beauty in all alike..
said to grow in dirty waters,
is but blissfull to the eye.
No one knows,Perhaps,
that spirits n springs of joy,
are its nutrition,
and its roots lie elsewhere,
in the dreams for pastures of green;.
of the beholders eyes,
God has blessed the lotus,
to seek its nutrition and its growth,
from that dreamer and the deliverer of
beauty whose eyes want to see beauty in all alike..
Thursday, June 14, 2012
कबीरा भाया सयाना !
कबीरा भाया सयाना मांगे गली गली उधार ,
बनिये उससे चातरे ना खोले कोई द्वार !
अगस्त्य
Sunday, June 10, 2012
प्रकृति !
प्रकृति !
जिस दिन तुम्हारे पति परमेश्वर
तुम्हारी ना मानकर
अपनी चलायें जाएँ
बेकदरी से पेश आयें
सब्जी लाने की एवज में
तुम पर अधिकार जमाएं
तुम ना मानो तो एक दो बार
कान पे तड़का भी लगाएं
ज़बरदस्ती रोंदकर तुम्हे
मुंह फेर सो जाएँ
उस दिन तुम हे प्रकृति
उन वीर्यकडों को सहेजकर
मत रख लेना
क्या फायदा – एक और
बलात्कारी पैदा करने से !
[ 24/12/93 को मेरी डायरी में लिखी गयी ]
अगस्त्य
Saturday, June 9, 2012
त्वदीयं वस्तु गोविन्दम – तूभ्ह्य्मेव समर्पया !
कितनी मंज़िलें मेरे आस पास होती,
ये बेवकूफ धरती ग़र घूमती न होती,
अक्ल मेँ भूसा भरा वो आदमी है कीमती,
वरना जुगाली करने को बुध्ही हमेशा रोती,
गन्दे मैले कागज़ों को थूक लगा के गिनता,
नोटोँ की गड्डी फिर भी कभी रद्दी नहीं होती,
हर मज़हब का हर देवता मेरे काम तो आया मग़र,
आजकल उतनी यँहा चढ़ोत्तरी नहीं होती,
घास चरते रहने का अपना अलग ही आनन्द है,
हम गधों की रेस में कभी जूताई नहीं होती,
मालिक ने मेरे माथे पे ये क्या लिख के भेजा,
इस भाषा की कहीं कोई पढ़ाई नहीं होती,
जी चाहता है हम भी करें दान पुण्य ऐ दोस्त,
काश मेरे दिल ने भी कूछ कमाई की होती !
त्वदीयं वस्तु
गोविन्दम – तूभ्ह्य्मेव समर्पया !
तेरी नदिया - तेरी कश्ती - तू मांझी - तू ही सवार
लहरे तेरी भंवर भी तू – तू ही किनारा तू मंझधार
नाले तेरे - सीवर भी तू – तू ही नगर निगम प्रदेश सरकार
नेता तेरे - मंत्री तेरे – तू ही दलाल तू ही भ्रष्टाचार
जंगल तेरे - पेड़ भी तू – तू डाल पात और घास पतवार
लकड़हारा तू - आरा भी तू – तू ही सीसम सागोन का कारोबार
आना तू - पाई भी तू – तू ही रूपया डालर और दिनार
मालिक भी तू सेवक भी तू – तू खुद को खुद बाटे है पगार
बुद्धि तू - बुद्धि में तू – बुद्धि से उपजा तू निराकार
कंही बुद्ध कंही जीसस है तू कंही हिटलर कंही नादिरशाह की तलवार
तू दाल और रोटी - नान परांठे - तू किस्म किस्म का मांसाहार
कंही भूख से तू मर जाता है - कंही लंबी लेता है तू डकार
पेरिस तू - न्यूयार्क भी तू – तू ही कालाहांडी और बिहार
हिरोशिमा नागासाकी तू – तू ही काबूल और तू ही कंधार
तू रिक्शा खींचे - रेहड़ी लगाये - तू ठुल्लों से खाए फटकार
नेता तू - अफसर भी तू – तू ही साहेब खूब करे व्यापार
कण कण में जब तू ही तू – तो मैं भी तू और तू मैं यार
ये कलम भी तू - कागज़ भी तू – खुद को खुद लिखता नानाप्रकार !
Friday, June 8, 2012
प्रशाद !
प्रशाद !
गाँव में इक गरीब सा मंदिर था , जन्हा गरीब गुरबे लोग अपने आपको
मानसिक तोर पर तसल्ली देने आ जाया करते थे ! चार छह घर पैसे वालों के भी थे – पर उनका
अपना – अपना अलग मंदिर था – अलग भगवान था – घर में ही , और वास्तव में उन घरों में
मंदिर इसलिए बने थे की उनकी बहूऐ – बेटियाँ कंही मंदिर जाने के नाम पर अपने - - - ही
में मूर्ती स्थापित करवा के ना आ जाएँ !
उस गरीब से मंदिर
का इक नोजवान पुजारी था , और - - - - उसकी एक खूबसूरत बीवी भी थी --- पुजारिन थी !
पुजारी शोकिया तौर पर पहलवानी करता था , सुबह शाम हनुमान की मूर्ती को चमकाता था
---- जय हनुमान ज्ञान गूंन सागर करता था , बाकी की तमाम चार छह हाँथ पैर वाली
मूर्तियों कि ज़िम्मेदारी उसकी बीवी की थी – जो की अपनी ज़िम्मेदारी अच्छी तरह समझती
थी और निभाती भी थी !
गाँव के अधिकतर पैसे वाले लोग जड़ से नास्तिक थे , और उन्हें ज़रूरत भी
क्या थी एक ही चीज़ को बार बार रटने की – पर फिर भी वो कभी कभार उस मंदिर में आ
जाया करते थे , पुजारी से मिलने ------ पुजारिन को देखने !
अऊर सब ठीक – ठाक बा ना पुजारी जी ? कऊनो प्राबलम होय तो बताया ! कहते
पुजारी से थे --- देखते पुजारिन की तरफ थे ! बाहर आकर आपस में बतियाते थे की --- का
हो – पूजारिनियाँ बहुत जोर जोर से सिवलिंग का मींज मींज के नऊहावत रही , का
च्च्क्कर बा --- ? ई पूजारिया खाली देखैंइन के पहलवान बा का ?
वो पुजारी – वो पहलवान एक दिन कूँये से पानी खिंच रहा था की ------ वो
धन्नी जिस पर रस्सी चलने वाली गडारी लगी होती है --- टूट गयी ----- पुजारी पानी
खींचता खींचता कुवें में खीच गया , अंदर पानी तक पहुचने से पहले ही पुजारी का सर
कूंवे की पक्की दिवार से टकराकर खुल गया ! जय हनुमान ज्ञान गुन सागर करने वाले का
राम नाम सत्य हो गया !
ये खबर मिलते ही की पुजारी मर गया , उस खूबसूरत ---- नोजावान पुजारिन
से प्रशाद मिलने की आस में गाँव के तमाम पैसे वाले नास्तिक --- उस के पति के निधन
पर दुख व्यक्त करने – खुशी खुशी आये !
[ मेरी डायरी में १९/०९/९३ को लिखी गयी ]
अगस्त्य
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