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Monday, August 16, 2021

आदमी को भूनकर ख़ाने लगे हैं


 कैसे कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं, 
 लोग गाते गाते चिल्लाने लगे हैं, 
 वो सलीबों के क़रीब आये तो, 
 हमको क़ायदा समझाने लगे हैं, 
 अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, 
 कमल के फूल भी मुरझाने लगे हैं, 
 अब नई तहज़ीब के पेशे नज़र हम, 
 आदमी को आदमी भूनकर ख़ाने लगे हैं, 
 कैसे कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं, 
 लोग गाते गाते चिल्लाने लगे हैं,  

  अनुभवि अज्ञानी 

Friday, August 6, 2021

हुक्मनामा


 किसी का हुक्म है सारी हवाएँ , हमेशा चलने से पहले बताएँ , कि उन की सम्त क्या है , किधर जा रही हैं , हवाओं को बताना ये भी होगा , चलेंगी अब तो क्या रफ़्तार होगी,  हवाओं को ये इजाज़त नहीं है , कि आँधी की इजाज़त अब नहीं है ,हमारी रेत की सब ये फ़सीलें, ये काग़ज़ के महल जो बन रहे हैं , हिफ़ाज़त उन की करना है ज़रूरी,और आँधी है पुरानी इन की दुश्मन,ये सभी जनते हैं , किसी का हुक्म है दरिया की लहरें , ज़रा ये सर-कशी कम कर लें अपनी हद में ठहरें ,उभरना फिर बिखरना और बिखर कर फिर उभरना , ग़लत है ये उन का हंगामा करना,  
ये सब है सिर्फ़ वहशत की अलामत ,बग़ावत की अलामत , बग़ावत तो नहीं बर्दाश्त होगी,ये वहशत तो नहीं बर्दाश्त होगी ,अगर लहरों को है दरिया में रहना , तो उन को होगा अब चुप-चाप बहना , किसी का हुक्म है ,इस गुलिस्ताँ में बस इक रंग के ही फूल होंगे, कुछ अफ़सर होंगे जो ये तय करेंगे , गुलिस्ताँ किस तरह बनना है कल का ,यक़ीनन फूल तो यक-रंगीं होंगे , मगर ये रंग होगा कितना गहरा कितना हल्का , ये अफ़सर तय करेंगे 
किसी को ये कोई कैसे बताए , गुलिस्ताँ में कहीं भी फूल यक-रंगीं नहीं होते , कभी हो ही नहीं सकते , कि हर इक रंग में छुप कर बहुत से रंग रहते हैं , जिन्होंने बाग़-ए-यक-रंगीं बनाना चाहे थे , उन को ज़रा देखो , कि जब इक रंग में सौ रंग ज़ाहिर हो गए हैं तो , कितने परेशाँ हैं कितने तंग रहते हैं , किसी को ये कोई कैसे बताए , हवाएँ और लहरें कब किसी का हुक्म सुनती हैं,  हवाएँ हाकिमों की मुट्ठियों में हथकड़ी में , क़ैद-ख़ानों में नहीं रुकतीं,  
ये लहरें रोकी जाती हैं , तो दरिया कितना भी हो पुर-सुकूँ बेताब होता है , और इस बेताबी का अगला क़दम सैलाब होता है  !

 जावेद अख्तर  साहेब 

Thursday, April 11, 2019

रेत की नाव , झाग के मांझी ...


रेत की नाव, झाग के मांझी

काठ की रेल, सीप के हाथी

हल्की—भारी प्लास्टिक की कलें

मोम के चाक जो रुके न चलें

राख के खेत, धूल के खलिहान

भाप के पैरहन, धुएं के मकान

नहर जादू की, पुल दुआओं के

झुनझुने चंद योजनाओं के

सूत के चेले, मूंज के उस्ताद

तेश दफ्ती के, काच के फरिहाद

आलिम आटे के, और रवे के इमाम

और पन्नी के शायराने—कराम

ऊन के तीर, रुई की शमशीर

सदर मिट्टी का और रबर के वजीर

अपने सारे खिलौने साथ लिए

दस्ते—खाली में कायनात लिए

दो सुतूनों में बौध के रस्सी

हम खुद न जाने कब से चलते हैं

न तो गिरते हैं न सम्हलते हैं
न तो गिरते हैं न सम्हलते हैं

*ओशो*

Friday, February 17, 2017

जनाब रहीम साहेब ! Raheem Dohe ....

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब
जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै
फलै अगाय॥
देनहार कोउ और है, भेजत
सो दिन रैन। 
लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे
नैन॥
अब रहीम मुसकिल परी, गाढ़े
दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलैं न
राम॥
गरज आपनी आप सों रहिमन
कहीं न जाया।
जैसे कुल की कुल वधू पर घर जात
लजाया॥
छमा बड़न को चाहिये, छोटन
को उत्पात।
कह ‘रहीम’ हरि का घट्यौ,
जो भृगु मारी लात॥
तरुवर फल नहिं खात है, सरवर
पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित,
संपति सँचहि सुजान॥
खीरा को मुंह काटि के,
मलियत लोन लगाय।
रहिमन करुए मुखन को, चहियत इहै
सजाय॥
जो रहीम उत्तम प्रकृति,
का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे
रहत भुजंग॥
जे गरीब सों हित करै,
धनि रहीम वे लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण
मिताई जोग॥
जो बड़ेन को लघु कहे, नहिं रहीम
घटि जांहि।
गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख
मानत नांहि॥
खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर,
प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल
जहान॥
टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे
सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोहिए,
टूटे मुक्ताहार॥
बिगरी बात बने नहीं, लाख
करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न
माखन होय॥
आब गई आदर गया, नैनन
गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गये,
जबहि कहा कछु देहि॥
चाह गई चिंता मिटी, मनुआ
बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे
साहन के साह॥
रहिमन देख बड़ेन को, लघु न
दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै
तलवारि॥
माली आवत देख के, कलियन करे
पुकारि।
फूले फूले चुनि लिये,
कालि हमारी बारि॥
रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन
जाहि।
उनते पहिले वे मुये, जिन मुख
निकसत नाहि॥
रहिमन विपदा ही भली,
जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में,
जानि परत सब कोय॥
रहिमन चुप हो बैठिये,
देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं
देर॥
बानी ऐसी बोलिये, मन
का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल
होय॥
मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज
सुभाय।
फट जाये तो ना मिले, कोटिन
करो उपाय॥
वे रहीम नर धन्य हैं, पर
उपकारी अंग।
बाँटनवारे को लगै,
ज्यौं मेंहदी को रंग॥
रहिमह ओछे नरन सो, बैर
भली ना प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ
भाँति विपरीत॥
रहिमन धागा प्रेम का, मत
तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ
परि जाय॥
रहिमन पानी राखिये, बिन
पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती,
मानुष, चून॥
रहीम !  

Friday, January 24, 2014

कान्हा हूँ मीरा अक्सर ज़हन में रहती है !


शहज़दियाँ कई हमको पहन के रहती हैं,

कान्हा हूँ मीरा अक्सर ज़हन में रहती है !

मैं भूल जाऊं जिसको वो बेचेन हो जाता है

मै याद करलूं जिसको वो मगन सी रहती है

कहते ही हैं की ग़ालिब का है अंदाज़े बयां कुछ और

हम भी गुनगूनाएं तो खुशबू चमन में रहती है

ईश्वर या अल्लाह का गुनाहगार नहीं हूँ

वो तो बस यूं ही कुछ मज़ाक में अनबन से रहती है !

अगस्त्य