Friday, February 17, 2017

वास्तविक धर्म और मनुष्य !


 

वास्तविक धर्म को ईश्वर और शैतान, स्वर्ग और नरक से कुछ लेना-देना नहीं है। धर्म के लिए अंग्रेज़ी में जो शब्द है "रिलीजन' वह महत्वपूर्ण है। उसे समझो, उसका मतलब है खंडों को, हिस्सों को संयुक्त करना; ताकि खंड-खंड न रह जाएं वरन पूर्ण हो जाएं। "रिलीजन' का मूल अर्थ है एक ऐसा संयोजन बिठाना कि अंश अंश न रहे बल्कि पूर्ण हो जाए। जुड़ कर प्रत्येक अंश स्वयं में संपूर्ण हो जाता है। पृथक रहते हुए प्रत्येक भाग निष्प्राण है। संयुक्त होते ही, अभिन्न होते ही एक नई गुणवत्ता प्रकट होती है-पूर्णता की गुणवत्ता। और जीवन में उस गुणवत्ता को जन्माना ही धर्म का लक्ष्य है। ईश्वर या शैतान से धर्म का कोई संबंध नहीं है।

लेकिन धर्मों ने जिस तरह से जगत में कार्य किया...उन्होंने उसका पूरा गुणधर्म, उसकी पूरी संरचना ही बदल डाली; बजाय इसके कि उसे बनाते: अंतस की एकता का विज्ञान, ताकि मनुष्य विखंडित न रहे, एक हो जाए। सामान्यतः तुम एक नहीं अनेक हो-पूरी भीड़ हो! धर्म का कार्य है इस भीड़-भाड़ को, अनेकता को एक समग्रता में ढालना; ताकि तुम्हारे भीतर का प्रत्येक अंग, अन्य अंगों के साथ एक स्वर में काम करने लगे-न कोई विभाजन हो, न संघर्ष; न कोई श्रेष्ठ हो, न निकृष्ट; न किसी प्रकार का द्वंद्व बचे...तुम बस एक लयबद्ध अखंडता हो जाओ। 

दुनिया के इन सारे धर्मों की वजह से मनुष्यता धर्म शब्द का अर्थ तक भूल गई है। वे अखंडित मनुष्य के खिलाफ हैं, क्योंकि अखंडित मनुष्य को न ईश्वर की जरूरत है, न पादरी-पुरोहितों की, न मंदिर-मस्जिदों और चर्चों की।

अखंडित मनुष्य आप्तकाम होता है-स्वयं में पर्याप्त। वह अपने आप में पूर्ण है। और मेरी दृष्टि में उसकी पूर्णता ही उसकी पवित्रता है। वह इतना परितृप्त है कि फिर उसे परम पिता के रूप में, दूर कहीं स्वर्ग में बैठे, उसकी देखभाल करने वाले किसी ईश्वर की कोई मानसिक जरूरत नहीं रह जाती। वह इस क्षण में इतना आनंदित है कि तुम उसे भावी कल के लिए भयभीत नहीं कर सकते। परिपूर्ण व्यक्ति के लिए कल का आस्तित्व ही नहीं होता। वर्तमान पल ही सब कुछ है-न तो वहां बीते हुए कल हैं और न ही आने वाले कल।

तुम एक अखंडित व्यक्ति को इन मूढ़तापूर्ण और बचकानी चालबाजियों से बहका नहीं सकते, अपनी इच्छानुसार नचा नहीं सकते कि ऐसा करने पर स्वर्ग एवं उसके सारे सुख उपलब्ध होंगे; और यदि वैसा काम किया तो नरक में गिर कर अनंतकाल तक दुख भोगोगे।

इन सभी धर्मों ने तुम्हें कल्पनाएं दी हैं, क्योंकि तुम्हारी कुछ मनोवैज्ञानिक जरूरतें हैं। या तो तुम मन के पार उठो जो कि सही मायने में धर्म है, या फिर कोरी कल्पनाओं में उलझे रहो; ताकि तुम्हारा मन रिक्त, अर्थहीन और अकेलेपन का अनुभव न करे-नदी में बहते तिनके की भांति, न पीछे जिसके स्रोत का पता है, न आगे किसी गंतव्य का।

मानव मन की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक जरूरत है-दूसरों के लिए स्वयं के जरूरी होने का अहसास।

सामान्यतः प्रतीत तो यही होता है कि यह अस्तित्व तुम्हारे प्रति पूर्णरूपेण उपेक्षा से भरा है। यह नहीं कहा जा सकता कि उसे तुम्हारी कोई जरूरत है; या कि कह सकते हो? तुम्हारे बिना भी सब कुछ बिलकुल ठीक-ठाक चलता था। रोज सूर्योदय होता था, फूल खिलते थे, मौसम आ-जा रहे थे। यदि तुम नहीं होते तो कुछ भी तो फर्क न पड़ता। एक दिन फिर तुम यहां नहीं होओगे और उससे रंचमात्र भी अंतर न आएगा। अस्तित्व जैसा चलता रहा है, चलता रहेगा। यह बात तुम्हें तृप्ति नहीं देती कि तुम्हारा होना न होना कोई अर्थ नहीं रखता। आवश्यक होना तुम्हारी सबसे बड़ी आवश्यकता है। ठीक इसके विपरीत अस्तित्व तुम्हें यह अहसास देता है कि जैसे उसे तुमसे कोई सरोकार नहीं है, उसे तुम्हारी परवाह नहीं है। शायद उसे यह तक पता नहीं कि तुम हो भी! यह स्थिति मन को बहुत झकझोरने वाली है। इसी कमजोरी का फायदा उठाया है तथाकथित धर्मों ने...।

प्रामाणिक धर्म तुम्हारी इस आवश्यकता को गिराने की हर संभव कोशिश करेगा, ताकि तुम स्पष्ट देख लो कि यह कतई आवश्यक नहीं है कि किसी को तुम्हारी आवश्यकता हो। और जब भी तुम स्वयं के आवश्यक होने की कामना करते हो, तुम थोथी कल्पनाओं की मांग करते हो।

ये तथाकथित धर्म जो पृथ्वी पर कई रूपों में मौजूद हैं-हिंदू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, जैन, बौद्ध, और न जाने कितने धर्म-जमीन पर कोई तीन सौ धर्म हैं और वे सब के सब एक ही काम में संलग्न हैं। वे ठीक उसी आवश्यकता की पूर्ति कर रहे हैं-तुम्हें झूठी तृप्ति दे रहे हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर है, जो तुम्हारी फ़िक्र लेता है, तुम्हारी देखभाल करता है। जो तुम्हारा इतना अधिक शुभचिंतक है कि तुम्हारे जीवन को मार्गदर्शन देने के लिए एक पवित्र ग्रंथ भेजता है, कि तुम्हारी सहायता के लिए, तुम्हें सही राह पर लाने के लिए अपना इकलौता बेटा भेजता है। वह पैगंबर और मसीहा भेजता है ताकि तुम कहीं भटक न जाओ। और यदि तुम भटक जाओ तो वे तुम्हारी दूसरी कमजोरी का शोेषण करते हैं-शैतान का भय, जो हर संभव ढंग से तुम्हें गलत रास्ते पर ले जाने की कोशिश में लगा है।

साधारणतः जैसी मनुष्यता इस समय है, एक तरफ तो इसे ईश्वर की, संरक्षक की, पथ प्रदर्शक की, और सहयोग की जरूरत है, और दूसरी तरफ एक नरक की, ताकि आदमी उन सभी रास्तों पर चलने से डरा रहे, जिन्हें पादरी-पुरोहित गलत समझते हैं। पर क्या गलत है और क्या सही है, हर समाज में यह भिन्न-भिन्न है। इसलिए सही और गलत समाज द्वारा निर्णीत होते हैं, उनका कोई अस्तित्वगत मूल्य नहीं है।

हां, एक सजगता की स्थिति है, जब तुम मन के पार चले जाते हो और बिना किसी पूर्वाग्रह के चीजों को सीधे-साफ देख सकते हो-आंखों पर मढ़े किसी सिद्धांत के बगैर। जब तुम सीधे देखते हो तो तत्क्षण सही और गलत का ज्ञान हो जाता है। किसी को बताने की जरूरत नहीं रह जाती, न किन्हीं आदेशों की आवश्यकता।

प्रत्येक समाज की अपनी धारणा है कि क्या सही है और क्या गलत है? पर जिसे वे गलत कहते हैं, उसे करने से तुम्हें कैसे रोकें? मुश्किल यह है कि जिसे वे अशुभ और पाप कहते हैं, अधिकांशतः वह प्राकृतिक है-और वह तुम्हें आकर्षित करता है। वह गलत है, मगर स्वाभाविक है-और स्वाभाविक के प्रति एक गहन आकर्षण है। उन्हें इतना ज्यादा भय पैदा करना पड़ता है कि वह स्वाभाविक आकर्षण की अपेक्षा अधिक बलशाली सिद्ध हो। इसीलिए नरक का आविष्कार करना पड़ा।

कई धर्म हैं जो एक नरक से संतुष्ट नहीं हैं। और मैं समझ सकता हूं कि क्यों वे एक नरक से संतुष्ट नहीं हैं। ईसाइयत एक नरक से संतुष्ट है। उसका सीधा कारण है कि ईसाई नरक शाश्वत है। उसमें लंबाई का विस्तार बहुत है, अंत ही नहीं आता। चूंकि हिंदुओं, जैनों, और बौद्धों के नरक शाश्वत नहीं हैं, इसलिए उन्हें ऊंचाइयां निर्मित करनी पड़ीं-सात नरक, एक के ऊपर एक! और हर नरक अधिक से अधिक पीड़ादायी होता जाता है, ज्यादा से ज्यादा अमानवीय।

और मुझे आश्चर्य होता है...वे लोग, जिन्होंने इन नरकों का पूरे घोर विस्तार से वर्णन किया है, संत कहलाते थे। वे लोग, यदि उन्हें मौका मिलता, तो बड़ी आसानी से एडोल्फ हिटलर, जोसेफ स्टैलिन, और माओत्से तुंग हो गए होते। उनको सब खयाल था कि कैसे सताया जाए, सिर्फ उनके पास शक्ति नहीं थी। लेकिन एक सूक्ष्म अर्थ में उनके पास भी शक्ति थी-पर वर्तमान में नहीं, यहां नहीं। उनकी ताकत थी उनके शंकराचार्य होने में, पोप और प्रमुख पादरी होने में। उस शक्ति के सहारे उन्होंने तुम्हें नरक में फिंकवाने का इंतजाम कर दिया। अभी न सही तो भविष्य में कभी-मृत्यु के बाद। वैसे तो मृत्यु स्वयं ही इतनी भयावह है...किंतु वह उनके लिए काफी नहीं थी। क्योंकि स्वाभाविक प्रवृत्तियां वास्तव में अत्यधिक प्रबल हैं। और वे लोग क्यों इन नैसर्गिक आकर्षणों के इतने खिलाफ थे? क्योंकि सहज प्रवृत्तियां उनके न्यस्त स्वार्थों के विरुद्ध पड़ती हैं।

सभी धर्मों ने सिखाया है कि गरीब धन्यभागी हैं। यह केवल जीसस की ही शिक्षा नहीं है। हां, वे उसे जरा ठीक ढंग से, एक वचन में, उक्ति के रूप में कह देते हैं कि "धन्यभागी" हैं वे जो दरिद्र हैं, क्योंकि वे ही प्रभु के राज्य में प्रवेश के अधिकारी होंगे।'"लेकिन मूलतः यह समस्त धर्मों की शिक्षा है। तुम्हें गरीबी को एक वरदान के रूप में, परमात्मा के द्वारा दी गई भेंट समझ कर अंगीकार करना चाहिए। यह सिर्फ तुम्हारी श्रद्धा की परीक्षा है। यदि तुम गरीबी की इस अग्नि-परीक्षा में बिना शिकायत के, चुपचाप, बगैर यह सोचे कि यह अन्याय है; यदि तुम ईश्वर की देन मान कर इससे गुजर जाते हो, तो प्रभु का राज्य तुम्हारा है।

यह लजारस के लिए बड़ी सांत्वना देने वाली बात है, जब जीसस उससे कहते हैं...ऐसा हुआ कि लजारस अत्यंत दरिद्र था। और गांव का सर्वाधिक संपन्न व्यक्ति अपने जन्म-दिन पर शानदार दावत दे रहा था। भूखा-प्यासा लजारस उस गांव से गुजरता था। उसने थोड़ा सा पानी मांगा तो नौकरों-चाकरों ने उसे धक्के मार कर बाहर निकाल दिया और बोले, ""क्या तुझे दिखाई नहीं देता कि हमारा मालिक एक भोज दे रहा है और बड़े-बड़े अतिथि इकट्ठे हुए हैं? और तू ठहरा एक मामूली भिखारी...तेरी भीतर घुसने की और पानी मांगने की हिम्मत कैसे पड़ी? चल, हट, भाग यहां से। जितनी जल्दी हो सके यहां से रफा-दफा हो जा।''

जीसस लजारस से कहते हैं, ""परेशान मत होओ। स्वर्ग में तुम सभी सुखों का उपभोग करोगे, और इस आदमी को नरक की आग में जलते हुए देखोगे-वह प्यास से तड़फ रहा होगा और तुमसे विनती करेगा कि लजारस मुझे थोड़ा सा पानी दे दो।'' कितनी भारी सांत्वना! लेकिन यह चालाकी है, गरीबों के क्रोध और ईर्ष्या से धनवानों को बचाने की साजिश है। धनी तो थोड़े हैं, निर्धन बहुत हैं। एक बार उन्हें यह खयाल आ जाए कि हमारी दरिद्रता वरदान नहीं, बल्कि अभिशाप है, शोेषण का परिणाम है; तो वे इन सारे धनवानों को मार ही डालेंगे। यह तरकीब दोनों प्रकार से बढ़िया है-दीन-हीन के लिए सांत्वना कि निर्धनता वरदान है; और समृद्ध के लिए सुरक्षा, क्योंकि अब गरीब विद्रोह नहीं कर सकते।

दुनिया में धर्मों के कारण गरीबी बनी हुई है, अन्यथा इसकी कोई और वजह नहीं; खासतौर से अब, जब कि विज्ञान और तकनीक इस पूरी पृथ्वी को स्वर्ग में बदल सकते हैं।

ये धार्मिक लोग इस पृथ्वी का स्वर्ग में रूपांतरण पंसद नहीं करेंगे, क्योंकि तब उनके स्वर्ग का क्या होगा? वे इस पृथ्वी को दरिद्र, भूखी, बीमार-जैसी दुर्दशा में वह है, वैसी ही रखना चाहते हैं, क्योंकि इसी पर उनका सारा व्यवसाय निर्भर है। अमीर चर्चों को दान देते हैं, क्योंकि चर्च उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है। बेचारे गरीब तक दान देते हैं, जिनके पास खाने को भी पर्याप्त नहीं है। वे इसलिए दान देते हैं क्योंकि चर्च उन्हें सांत्वना देता है, और उनका मार्ग दर्शन करता है। यह जीवन बहुत छोटा है, कुछ ज्यादा तो है नहीं; और इसका भी अधिक हिस्सा तो गुजर चुका, अब थोड़ा सा शेष है-वह भी गुजर जाएगा। और फिर उसके बाद स्वर्ग में अनंत सुखों वाला शाश्वत जीवन है। चर्च उसका रास्ता बताता है। जीसस तुम्हें राह दिखाते हैं।

प्राकृतिक जरूरतें, जैसे कामवासना, भूख...ये धार्मिक लोग तुम्हें उपवास करना सिखाते हैं। अब, यह प्रकृति के विरुद्ध है। उपवास करना उतना ही हानिप्रद है, जितना आवश्यकता से अधिक भोजन करना। यदि तुम बहुत ज्यादा खाते हो, पेट में ठूंसते ही जाते हो, तो वह भी अस्वाभाविक है। तुम्हारे अंदर मनोवैज्ञानिक रूप से कुछ गड़बड़ है। शायद भीतर तुम इतना खालीपन अनुभव कर रहे हो कि उस आंतरिक रिक्तता को भरने के लिए, जो भी खाने की चीज तुम्हारे हाथ लग जाए, उसे ही अपने पेट में डाल लेते हो।

धर्मों ने तुम्हें तुम्हारी स्वाभाविक इच्छाओं और प्रवृत्तियों के विरोध में क्यों रखा? कारण सीधा-साफ है-तुम्हें अपराध-भाव महसूस कराने के लिए। इस शब्द को मैं दोहराना चाहता हूं-"अपराध-भाव।' यह उनका खास मुद्दा रहा है, केंद्र-बिंदु रहा है तुम्हें मिटाने में, तुम्हारे शोषण में, तुम्हें उनकी इच्छानुसार ढालने में, तुम्हें निकृष्ट सिद्ध करने में, और तुम्हारा आत्म-सम्मान नष्ट करने में।

एक बार अपराध-भाव उत्पन्न कर दिया, एक बार तुमने यह सोचना शुरू कर दिया कि "मैं पतित आदमी हूं, एक पापी हूं'' बस, उनका काम हो गया। तब कौन तुम्हें उबारेगा? निश्चित ही किसी उद्धार करने वाले की जरूरत पड़ेगी। लेकिन पहले बीमारी पैदा करो। 

From my Master's Mouth...

 

जनाब रहीम साहेब ! Raheem Dohe ....

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब
जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै
फलै अगाय॥
देनहार कोउ और है, भेजत
सो दिन रैन। 
लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे
नैन॥
अब रहीम मुसकिल परी, गाढ़े
दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलैं न
राम॥
गरज आपनी आप सों रहिमन
कहीं न जाया।
जैसे कुल की कुल वधू पर घर जात
लजाया॥
छमा बड़न को चाहिये, छोटन
को उत्पात।
कह ‘रहीम’ हरि का घट्यौ,
जो भृगु मारी लात॥
तरुवर फल नहिं खात है, सरवर
पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित,
संपति सँचहि सुजान॥
खीरा को मुंह काटि के,
मलियत लोन लगाय।
रहिमन करुए मुखन को, चहियत इहै
सजाय॥
जो रहीम उत्तम प्रकृति,
का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे
रहत भुजंग॥
जे गरीब सों हित करै,
धनि रहीम वे लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण
मिताई जोग॥
जो बड़ेन को लघु कहे, नहिं रहीम
घटि जांहि।
गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख
मानत नांहि॥
खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर,
प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल
जहान॥
टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे
सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोहिए,
टूटे मुक्ताहार॥
बिगरी बात बने नहीं, लाख
करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न
माखन होय॥
आब गई आदर गया, नैनन
गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गये,
जबहि कहा कछु देहि॥
चाह गई चिंता मिटी, मनुआ
बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे
साहन के साह॥
रहिमन देख बड़ेन को, लघु न
दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै
तलवारि॥
माली आवत देख के, कलियन करे
पुकारि।
फूले फूले चुनि लिये,
कालि हमारी बारि॥
रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन
जाहि।
उनते पहिले वे मुये, जिन मुख
निकसत नाहि॥
रहिमन विपदा ही भली,
जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में,
जानि परत सब कोय॥
रहिमन चुप हो बैठिये,
देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं
देर॥
बानी ऐसी बोलिये, मन
का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल
होय॥
मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज
सुभाय।
फट जाये तो ना मिले, कोटिन
करो उपाय॥
वे रहीम नर धन्य हैं, पर
उपकारी अंग।
बाँटनवारे को लगै,
ज्यौं मेंहदी को रंग॥
रहिमह ओछे नरन सो, बैर
भली ना प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ
भाँति विपरीत॥
रहिमन धागा प्रेम का, मत
तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ
परि जाय॥
रहिमन पानी राखिये, बिन
पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती,
मानुष, चून॥
रहीम !  

Thursday, February 16, 2017

At the doorsteps of God !

At the doorsteps of God

The fear comes at the moment when you come to dissolve your last part, because then it will be irrevocable; you will not be able to come back.

I have told many times a beautiful poem of Rabindranath Tagore. The poet has been searching for God for millions of lives. He has seen him sometimes, far away, near a star, and he started moving that way, but by the time he reached that star, God has moved to some other place.

But he went on searching and searching — he was determined to find God’s home — and the surprise of surprises was, one day he actually reached a house where on the door was written: “God’s Home.”

You can understand his ecstasy, you can understand his joy. He runs up the steps, and just as he is going to knock on the door, suddenly his hand freezes. An idea arises in him: “If by chance this is really the home of God, then I am finished, my seeking is finished. I have become identified with my seeking, with my search. I don’t know anything else. If the door opens and I face God, I am finished — the search is over. Then what? Then there is an eternity of boredom — no excitement, no discovery, no new challenge, because there cannot be any challenge greater than God.”

He starts trembling with fear, takes his shoes off his feet, and descends back down the beautiful marble steps. He took the shoes off so that no noise was made, for his fear was that even a noise on the steps… God may open the door, although he has not knocked. And then he runs as fast as he has never run before. He used to think that he had been running after God as fast as he can, but today, suddenly, he finds energy which was never available to him before. He runs as he has never run, not looking back.

The poem ends, “I am still searching for God. I know his home, so I avoid it and search everywhere else. The excitement is great, the challenge is great, and in my search I continue, I continue to exist. God is a danger — I will be annihilated. But now I am not afraid even of God, because I know His home. So, leaving His home aside, I go on searching for him all around the universe. And deep down I know my search is not for God; my search is to nourish my ego.”

From my Master's Mouth...

  

Tuesday, February 14, 2017

Book of Zen........


Mind and Body.......

The mind is human, the body is still animal.

Whenever you feel bored you will feel restless. Restlessness is an indication of the body. The body is saying, “Move away from here. Go anywhere, but don’t be here.” But the mind goes on smiling and the eyes go on sparkling, and you go on saying that you are listening and you have never heard such a beautiful thing. The mind is civilized, the body is still wild. The mind is human, the body is still animal. The mind is false, the body is true. The mind knows the rules and regulations - how to behave and how to behave rightly - so even if you meet a bore you say, “I am so happy, so glad to see you!” And deep down, if you were allowed you would kill this man. He tempts you to murder. Then you become fidgety, then you feel restlessness.

If you listen to the body and run away, the restlessness will disappear. Try it. Try it! If somebody is boring simply start jumping and running around. See: restlessness will disappear because restlessness simply shows that the energy does not want to be here. The energy is already on the move, the energy has already left this place. Now you follow energy.

So the real thing is to understand boredom, not restlessness. Boredom is a very, very significant phenomenon. Only man feels bored, no other animal. You cannot make a buffalo bored - impossible! Only man gets bored because only man is conscious. Consciousness is the cause. The more sensitive you are, the more alert you are, the more conscious you are, the more you will feel bored. You will feel bored in more situations. A mediocre mind does not feel so bored. He goes on, he accepts: whatsoever is, is okay; he is not so alert. The more alert you become, the more fresh, the more you will feel it if some situation is just a repetition, if some situation is just getting hard on you, if some situation is just stale. The more sensitive you are the more bored you will become.

Boredom is an indication of sensitivity. Trees are not bored, animals are not bored, rocks are not bored, because they are not sensitive enough. This has to be one of the basic understandings about your boredom: that you are sensitive.

But buddhas are also not bored. You cannot bore a buddha. Animals are not bored and buddhas are not bored, so boredom exists as a middle phenomenon between the animal and the buddha. For boredom, a little more sensitivity is needed than is given to the animal. And if you want to get beyond it then you have to become totally sensitive - then again the boredom disappears. But in the middle the boredom is there. Either you become animal-like, then boredom disappears.





Fearless Men...




A fearless man is one who has come to know the deathless within himself, one who has come to understand the inner, the immortal, the innermost eternal. Then there is no fear, and then there is no bravery either, because bravery is just a cover-up. This man is neither a fool nor is he wise, because wisdom is simply nothing but a cover-up. And this man is not divided into opposites: this man is a unity, he is one, he is a unique phenomenon; that is why you cannot define him. It is impossible to define a buddha. How will you define him? Will you call him a coward? You cannot! Will you call him brave? You cannot! Will you call him a fool? You cannot! Will you call him wise? No! Because wisdom is the opposite of foolishness and bravery is the opposite of cowardice.

What will you call a buddha? Whatsoever you call a buddha will be wrong. You have to be simply silent before a buddha. Will you call him a sinner or a saint? No, he is neither. How can you be a saint without sin inside? Sainthood is nothing but a decoration, a cover-up. This is the problem. Whenever a buddha appears, this is the problem: we cannot define him, we cannot put him into any category. You cannot label him, there is no way you can put him anywhere. Either he belongs to everywhere or he belongs to nowhere. He transcends all categories. Pigeonholes are not for him. The whole language drops before a buddha, the mind becomes silent. You cannot say anything which can be relevant. He is fearless, he is mindless; you cannot call him a fool or a wise man because the mind is needed for both.


From my Master's Mouth... 

Monday, February 13, 2017

Thinking Problems



This peace is not dead, it is not flat.

The most difficult thing in your life — which should really be the easiest — is to sit by the side of the flow of your mind. Your mind is just like a river. Thoughts and thoughts and a crowd of thoughts go on passing. You simply sit by the bank, unconcerned, just a witness, and you are in for a great surprise.

Slowly slowly, as you become more and more centered and simply a witness, thoughts start disappearing. They can exist only with your identification.You give energy to your mind. When you pull yourself out, you have stopped giving nourishment to the mind. And once there is no nourishment — thoughts are very fragile things — they start dying out.

Soon there is silence, there is peace. And this peace is not the peace of a cemetery. This peace is not dead, it is not flat. It is such a tremendous experience that once you have reached the first rung of the ladder, the ladder goes to infinity. You can go on and on discovering new layers of peace. This is the real excitement, unending excitement. That’s the meaning of the word “ecstasy”: unending excitement. You cannot exhaust it, you cannot come to a point where you say, “There is no more to discover and I am feeling flat.” It has never happened. On my own authority I say to you, I have been going as fast as possible, deeper and deeper into silence, but there is no bottom, there is no limit.

Each moment of silence brings new fragrance. Peace brings new flowers. Nothing is said, but much is heard. Nothing is shown, but much is seen. Nobody guides you, but some magnetic force of peace itself takes you farther and farther away from the mind, from the body, from the neighbors, from the wife, from the husband. And the excitement is continuously deepening.

Unless we can create millions of people around the earth who have experienced this kind of peace, war is inevitable, because people cannot survive flat lives. It is better to go into a war and have a little excitement, although it means death.

If a man who has not known inner peace is forced to live peacefully, he will either murder or kill himself. Even that will provide some excitement. Excitement is a great nourishment, but only the right kind of excitement is nourishment. The wrong kind of excitement is poison. And up to now humanity has been dominated by the wrong kind of excitement.

You are here with me to learn a very simple thing: to enjoy peace, to enjoy silence, to enjoy something that is within you and you dOshoo not have to depend on others for.





From my Master's Mouth.... 

Friday, February 3, 2017

Common Question's and Answers

  
          On a  web quora I saw that many questions or concerns are like same ... Word's and Language little bit different .... So.... I think that why don't I write this all kind of stuff on my Blog ?
So ... Some helpful information about Life and different types of problems with help of my Master's Mouth...

My Dear friends and family members the entire life is good for mankind but some people don't think it might be helpful so This message from my Master's Mouth and may be helpful for some people ...

Suicide is a Permanent  Solution for a Temporary Problem
There is a deep desire in everyone to commit suicide for the simple reason, that life seems to be meaningless. People go on living, not because they love life, they go on living just because they are afraid to commit suicide. There is a desire to; and in many ways they do commit suicide. Monks and nuns have committed psychological suicide, they have renounced life. And these suicidal people have dominated humanity for centuries. They have condemned everything that is beautiful. They have praised something imaginary and they have condemned the real; the real is mundane and the imaginary is sacred. My whole effort here is to help you see that the real is sacred, that this very world is sacred, that this very life is divine. But the way to see it is first to enquire within. Unless you start feeling the source of light within yourself, you will not be able to see that light anywhere else. First it has to be experienced within one’s own being, then it is found everywhere. Then the whole existence becomes so full of light, so full of joy, so full of meaning and poetry, that each moment one feels grateful for all that god has given, for all that he goes on giving. Sannyas is simply a decision to turn in, to look in. The most primary thing is to find your own center. Once it is found, once you are centered, once you are bathed in your own light you have a different vision, a different perspective, and the whole of life becomes golden. Then even dust is divine. Then life is so rich, so abundantly rich that one can only feel a tremendous gratitude towards existence. That gratitude becomes prayer. Before that, all prayer is false.

Thinking....

THINKING cannot be stopped. Not that it does not stop, but it cannot be stopped. It stops of its own accord. This distinction has to be understood, otherwise you can go mad chasing your mind. No-mind does not arise by stopping thinking. When the thinking is no more, no-mind is. The very effort to stop will create more anxiety, it will create conflict, it will make you split. You will be in a constant turmoil within. This is not going to help.

And even if you succeed in stopping it forcibly for a few moments, it is not an achievement at all -- because those few moments will be almost dead, they will not be alive. You may feel a sort of stillness, but not silence, because a forced stillness is not silence. Underneath it, deep in the unconscious, the repressed mind goes on working. So, there is no way to stop the mind. But the mind stops -- that is certain. It stops of its own accord.

So what to do? -- your question is relevant. Watch -- don't try to stop. There is no need to do any action against the mind. In the first place, who will do it? It will be mind fighting mind itself. You will divide your mind into two; one that is trying to boss over -- the top-dog -- trying to kill the other part of itself, which is absurd. It is a foolish game. It can drive you crazy. Don't try to stop the mind or the thinking -- just watch it, allow it. Allow it total freedom. Let it run as fast as it wants. You don't try in any way to control it. You just be a witness. It is beautiful!

Mind is one of the most beautiful mechanisms. Science has not yet been able to create anything parallel to mind. Mind still remains the masterpiece -- so complicated, so tremendously powerful, with so many potentialities. Watch it! Enjoy it! And don't watch like an enemy, because if you look at the mind like an enemy, you cannot watch. You are already prejudiced; you are already against. You have already decided that something is wrong with the mind -- you have already concluded.

And whenever you look at somebody as an enemy you never look deep, you never look into the eyes. You avoid! Watching the mind means: look at it with deep love, with deep respect, reverence -- it is God's gift to you! Nothing is wrong in mind itself. Nothing is wrong in thinking itself. It is a beautiful process as other processes are. Clouds moving in the sky are beautiful -- why not thoughts moving into the inner sky? Flowers coming to the trees are beautiful -- why not thoughts flowering into your being.

The river running to the ocean is beautiful -- why not this stream of thoughts running somewhere to an unknown destiny? is it not beautiful? Look with deep reverence. Don't be a fighter -- be a lover. Watch! -- the subtle nuances of the mind; the sudden turns, the beautiful turns; the sudden jumps and leaps; the games that mind goes on playing; the dreams that it weaves -- the imagination, the memory; the thousand and one projections that it creates. Watch! Standing there, aloof, distant, not involved, by and by you will start feeling...

The deeper your watchfulness becomes, the deeper your awareness becomes, and gaps start arising, intervals. One thought goes and another has not come, and there is a gap. One cloud has passed, another is coming and there is a g mkap. In those gaps, for the first time you will have glimpses of no-mind, you will have the taste of no-mind. Call it taste of Zen, or Tao, or Yoga. In those small intervals, suddenly the sky is clear and the sun is shining. Suddenly the world is full of mystery because all barriers are dropped. The screen on your eyes is no more there.

You see clearly, you see penetratingly. The whole existence becomes transparent. In the beginning, these will be just rare moments, few and far in between. But they will give you glimpses of what samadhi is. Small pools of silence -- they will come and they will disappear. But now you know that you are on the right track -- you start watching again. When a thought passes, you watch it; when an interval passes, you watch it. Clouds are also beautiful; sunshine also is beautiful. Now you are not a chooser.

Now you don't have a fixed mind: you don't say, "I would like only the intervals." That is stupid -- because once you become attached to wanting only the intervals, you have decided again against thinking. And then those intervals will disappear. They happen only when you are very distant, aloof. They happen, they cannot be brought. They happen, you cannot force them to happen. They are spontaneous happenings. Go on watching. Let thoughts come and go -- wherever they want to go. Nothing is wrong! Don't try to manipulate and don't try to direct.

Depression....

If you are depressed, so be depressed; don’t do anything. And what can you do? Whatsoever you do will be done out of depression, so it will create more confusion. You can pray to God, but you will pray so depressingly that you will even make God depressed through your prayers. Don’t do that violence. Your prayer is going to be a depressed prayer.

You can meditate, but what will you do? The depression will be there. Because you are depressed, whatsoever you do the depression will follow. More confusion will be created, more frustration, because you cannot succeed. And when you cannot succeed you will feel more depressed, and this can go on ad infinitum. It is better to remain with the first depression than to create a second circle and then a third circle. Remain with the first; the original is beautiful. The second will be false, and the third will be a far-off echo. Don’t create these. The first is beautiful. You are depressed, so this is how existence is happening to you at this moment.

You are depressed, so remain with it. Wait and watch. You cannot be depressed for long because in this world nothing is permanent. This world is a flux. This world cannot change its basic law for you so that you remain depressed forever. Nothing is here forever; everything is moving and changing. Existence is a river; it cannot stop for you, just for you, so that you remain depressed forever. It is moving, it has already moved. If you look at your depression, you will feel that even your depression is not the same the next moment; it is different, it is changing. Just watch, remain with it and don’t do anything. This is how transformation happens through non-doing. This is what is meant by “effortless effort.”

Feel depression, taste it deeply, live it. It is your fate. Then suddenly you will feel it has disappeared because the man who can accept even depression cannot be depressed. A man, a mind, who can accept even depression cannot remain depressed! Depression needs a non-accepting mind. “This is not good, that is not good; this should not be, that should not be; this must not be like this.” Everything is denied, rejected - not accepted. “No” is basic. Even happiness will be rejected by such a mind. Such a mind will find something to reject in happiness also.

Confidence.....

What you call self-confidence is just a lack of it, hence you need it. A man of real self-confidence never carries so much luggage. Why should he carry it? Why should he be concerned about self-confidence? He has it. Nobody can rob him of it, nobody can steal it. There is no way of losing it, you will not need to carry it. When you carry it you show only one thing - you don’t have it.

People who don’t have any self-confidence create a false self-confidence as a substitute. They are trembling inside, they are afraid inside. Deep down is cowardice but on the surface they pretend that they are brave people, very courageous. Deep down is ignorance but on the surface they are very knowledgeable. Deep down they don’t know anything and on the surface they are ready with all the answers possible to every possible question.

What do you need self-confidence for? If you are, self-confidence will be like a shadow to you. It will follow you. You don’t carry your shadow, you don’t look back again and again to see whether it is coming or not, you don’t get an insurance for it. You don’t care. It follows. Self-confidence is always there when you have become a self.

Freedom.....

Real Freedom

I have heard….
Once Diogenes was caught by a few people, robbers. Diogenes was a very healthy mystic. In the West, he seems to be the only person who can be compared to Mahavira in the East. He used to live naked, and he had a beautiful body. It is said that even Alexander was jealous of him. And he was a naked fakir; he had nothing other than his glory, than his own beauty. He was caught: he was meditating under a tree in a forest, and a few robbers caught him. And they thought, ”It is good. We can get a good price for him. He can be sold in a slave market.” But they were afraid, because the man looked very strong. The robbers were at least half a dozen, but still they were afraid. And they approached very cautiously because he could be dangerous. He alone seemed to be enough for six people.

Diogenes looked at them and said, ”Don’t be afraid. Don’t be afraid, I’m not going to fight you. You can come close to me, and you can put your chains on me.” They were surprised. They chained him, they made him a prisoner, and they took him away to the marketplace. On the way he said, ”But why have you chained me? You could have just asked me, and I would have followed. Why make such fuss about it?” They said, ”We cannot believe that somebody is so willing to become a slave!”
And Diogenes laughed and he said, ”Because I am a free man, I am not worried about this.” they could not understand. Then, in the marketplace, standing in the middle of the market, he shouted, ”A Master has come to be sold here. Is some slave desirous of purchasing him?” Look what he said: ”A Master has come to be sold here. Is some slave desirous of purchasing him?”

A Master is a Master. Real freedom is not against bondage, real freedom is beyond bondage.

If your freedom is against bondage, you are not really free. You can escape to the Himalayas just because you are afraid of the marketplace and the wife and the children, but you are not really a free man. The Himalayas cannot become your freedom. You are afraid of the wife; and if the wife comes to see you in the Himalayas, you will start trembling. Your henpecked husband will suddenly be there.

Power Politician and Intelligence...

But the misfortune is that power is in the hands of the wrong people, and the people of intelligence are devoid of power. I will tell you a small story to make it clear….

A great mystic heard that one of his friends, a childhood friend — they had played together, studied together — had become the prime minister of the country. Just to congratulate him, the mystic came down from the mountains. It was a long journey, tiring. By the time he reached the prime minister’s palace, the prime minister was getting ready to go somewhere.
He recognized the mystic, but he said, “I’m sorry, I have some appointments. I have to go to three places, and I would love it if you can come with me. On the way we can talk and remember the golden old days.”
The mystic said, “I would love to come with you, but you can see my rags are full of dust. It would not look right to sit by your side on a golden chariot.”

The prime minister said, “Don’t be worried. The king has presented me with a very costly overcoat. I have never used it; I have been keeping it for some special occasion. I will give you the coat. You just put it on; it will cover your clothes, the dust and everything.” The coat was given to him.
They reached the first house. They entered the house. The prime minister introduced his friend: “He is a great mystic. He lives in the mountains.
Everything that he has is his own, except the coat — that is mine.”
The mystic could not believe it: “What kind of stupidity is this?”
Even the family was shocked, to insult the mystic in such a way.
Outside the house the mystic said, “It is better I do not accompany you. You insulted me. What was the need to say that it is your coat? They were not asking.”

He said, “I am sorry, forgive me. And if you don’t come with me to the next appointment, I will think you have not forgiven me.”
The mystic was a simple-hearted man. He said, “Then it is okay, I am coming.”
Entering the second house, the prime minister introduced him: “He is a great mystic who lives in the mountains. Everything is his — even the coat is his!”
The mystic could not believe that this man had any intelligence at all. Outside he simply refused: “I cannot go to your third appointment. This is too much.”

But the politician said, “I have said that the coat is yours!” The mystic said, “It is unbelievable how unintelligent a man can be. Your assertion, emphasis, that the coat is mine, creates suspicion: there is something you are hiding. What is the need to mention the coat at all? I don’t see the point that in any introduction coats need to be introduced.”
And the politician said, “Forgive me, but if you don’t come to the third appointment I will never forget that I have hurt you. Please, there is only one more appointment, and I will not say that the coat is yours or the coat is mine. Don’t be worried about it.”
The simple mystic, innocent, agreed to go with him. At the third house he introduced the mystic in the same way, “He is a great mystic from the mountains. All the clothes are his, but as far as the coat is concerned, it is better not to say anything!”

The politician is not the most intelligent part of humanity. Otherwise there would not have been five thousand wars in three thousand years. The politician has destroyed, but has not created anything. It is the politician who is creating the atomic weapons, the nuclear missiles. With what face can he make the people of the world aware that the future is dark, dismal?




Wednesday, February 1, 2017

सच और झूठ !



तुमने देखा, झूठे आदमी ज्यादा कसमें खाते हैं। हर बात में कसम खाने को तैयार रहते हैं। झूठा आदमी कसम के सहारे चलता है। वह अपनी झूठ को कसम के सहारे सच बताना चाहता है।

पश्चिम में ईसाइयों का एक छोटा सा रहस्यवादी संप्रदाय है, क्वेकर। वे अदालत में भी कसम खाने को राजी नहीं होते। सैकड़ों बार तो उनको इसीलिए सजा भोगनी पड़ी है, क्योंकि अदालत में वह कसम खानी ही पड़ेगी बाइबिल हाथ में लेकर कि मैं सच बोलूंगा। लेकिन क्वेकर्स का कहना भी बड़ा सही है, वे कहते हैं कि मैं सच बोलूंगा, यह भी कोई कसम खाने की बात है! और अगर मैं झूठ बोलने वाला हूं तो कसम भी झूठी खा लूंगा। यह बात ही फिजूल है, यह बात ही मूढ़तापूर्ण है। एक झूठे आदमी से कहो कि यह हाथ में लेकर कुरान या बाइबिल या गीता कसम खा लो कि सच बोलोगे। अब अगर वह आदमी सच में झूठा है, तो वह कसम खा लेगा कि लाओ, कसम खा लेता हूं। झूठ बोलने वाले आदमी को झूठी कसम खाने में कौन सी बाधा है! और सच बोलने वाला आदमी जरूर कहेगा कि मैं कसम क्यों खाऊं, क्योंकि मैं जो बोलता हूं वह सच ही है। कसम खाने का तो मतलब होगा कि बिना कसम खाए जो बोलता हूं, वह झूठ है।

इसलिए क्वेकर कसम नहीं खाते। वे कहते हैं, कसम खाने का तो मतलब ही यह हुआ कि बिना कसम खायी गयी बात झूठ है। हम सच ही बोलते हैं, कसम और गैर-कसम का कोई सवाल नहीं है!



Innovation innovators n Marketing ....... in Hindi

"रचनात्मकता नई चीजों की सोच रही है.
आविष्कार नई बातें कर रही है. "


आविष्कार क्या है? आविष्कार ------------ बेहतर या अधिक प्रभावी उत्पादों, प्रक्रियाओं, सेवाओं, प्रौद्योगिकी, या विचार है कि आसानी से बाजार, सरकारों, और समाज के लिए उपलब्ध हैं का निर्माण है. आविष्कार नवविचार से अलग है कि नवाचार में बेहतर का उपयोग करने के लिए संदर्भित करता है और, एक परिणाम है, उपन्यास विचार या विधि के रूप में, जबकि आविष्कार विचार या खुद विधि का निर्माण करने के लिए और अधिक सीधे संदर्भित करता है. ("को बदलने के" Innovar Lat.) के बजाय एक ही बात को बेहतर कर रहे हैं आविष्कार कि नवाचार में सुधार से कुछ अलग करने की धारणा को संदर्भित करता है अलग है.

आविष्कारक्  और भावना तो कला और सामाजिक विज्ञान के रूप में के रूप में अच्छी तरह से इंजीनियरिंग या चिकित्सा से आ सकता है --------------. यह नए उत्पादों या सेवाओं के आकार ले जा सकते हैं, नए उद्यम, उद्यम समर्थित से शुरू गैर लाभ को लेकर है, के रूप में के रूप में अच्छी तरह से नए संगठनात्मक मॉडल. आविष्कार किसी भी पूर्वाग्रहको तोडना या उन्नत करने का  दृष्टिकोण या उन्नति है कि जिस तरह से हम रहते हैं, काम करते हैं, और खेलने में परिवर्तन हो सकता है.


आप केवल अगर आप को सफलतापूर्वक मौजूदा सबसे अच्छा अभ्यास को चुनौती देने के लिए नया कर सकते हैं. यह प्रश्न पूछ "क्यों नहीं?" क्यों नहीं आप कुछ कर सकते हैं शुरू होता है? माना जाता है कि कुछ गलत क्यों है? अपनी भूमिका के आधार पर इन सवालों भिन्न हो सकते हैं. उदाहरण के लिए: टूथब्रश से क्यों नहीं निकाल  सकते हैं - टूथपेस्ट?



समस्या सोच कौशल और सोच प्रक्रियाओं को सुलझाने, कार्यशाला में स्कूल के रूप में के रूप में अच्छी तरह से शिक्षकों को छात्रों का समर्थन करने के लिए एक अनुभवात्मक विधि के माध्यम से मानव सोचा प्रक्रिया को समझने और उन्हें के.जी. की बारहवीं ग्रेड स्कूल के बच्चों के लिए प्रासंगिक कौशल सोच और सोच प्रक्रियाओं की मूल बातें करने के लिए शुरू किया.
यह परे दिनचर्या के बारे में धक्का है और नए दृष्टिकोण की कोशिश कर रहा है.
इसके बारे में क्यों पूछ रहा है इसके बारे में को साकार है कि आम तौर पर वहाँ एक अच्छा कारण क्यों नहीं है, लेकिन यह भी.
एक व्यापार के नजरिए से यह लाभ और नुकसान और कानूनी और नैतिक मुद्दों पर विचार का मतलब है.
अवचेतन मन जैसे अहा क्षणों की दिशा में एक प्रमुख ड्राइवर हो सकता है.
होश में जागरूकता मानसिक गतिविधि के बाहर जारी है जो विचार क्यों अक्सर देनिक स्वप्न  के माध्यम से हमारे पास आते हैं, या एक अच्छी रात की नींद के बाद है.
अधिकांश विचारों को कुछ और है कि अपने ज्ञान के आधार के भीतर मौजूद है के तथ्य यह संशोधनों में हैं.
कल्पना, बुद्धि, और मौजूदा ज्ञान का उपयोग करके आप अपने मन में एक नया विचार या विचार के रूप में कर सकते हैं.
यह अपने बौद्धिक व्यक्तित्व का हिस्सा है और हर रोज स्थितियों के लिए लागू किया जा सकता है.
आपके रचनात्मक सोच की क्षमता तीन मानव सोचा प्रसंस्करण कार्यों के आसपास बनाया गया है:
1. रणनीति: कैसे आप को संगठित और अपने सोचा प्रक्रियाओं की योजना है. विचार और विचारों और भविष्य में किसी भी स्थिति या समस्या के आधार पर योजनाओं का मूल्यांकन.
2. नॉलेज बेस: अपने विषयों और समस्या डोमेन के एक समूह पर प्राप्त जानकारी. आप इस जानकारी पर आकर्षित करने में समस्याओं को हल करने के लिए या स्थितियों के लिए नई सोच के जोड़ करने में सक्षम हो.
3. प्रेरणा और अपना रवैया: ऐसे कारकों अक्सर अपने व्यक्तित्व, ऊर्जा स्तर, दृढ़ता और अपने आत्म विश्वास जो बारी में अनुभव और बातचीत का एक जीवन भर से प्राप्त कर रहे हैं के द्वारा संचालित कर रहे हैं. प्रेरणा और रवैया फैसलों और दिशा है कि आप में आदेश लेने के लिए एक वांछित परिणाम पाने को प्रभावित करता है.
रचनात्मक सोच संसृत सोच और अलग सोच से प्रेरित है और हर निर्णय है कि आप एक खास दिन में इन दोनों घटकों के शामिल है.
वृद्धिशील नवाचार जबकि कट्टरपंथी नवाचार मौजूदा बाजार पूरी तरह से दुनिया के लिए कुछ नया उपलब्ध कराने के द्वारा क्या वर्तमान में अस्तित्व में सुधार के द्वारा मौजूदा उत्पादों, प्रक्रियाओं या प्रौद्योगिकियों कारनामे.



पेटेंट बौद्धिक संपदा का एक रूप है. यह अनन्य एक संप्रभु राज्य द्वारा एक या एक आविष्कार के सार्वजनिक प्रकटीकरण के लिए विदेशी मुद्रा में एक सीमित समयावधि के लिए उनके समनुदेशिती आविष्कारक दी अधिकारों का एक सेट के होते हैं. और विशेष अधिकारों की हद तक के लिए प्रक्रिया देशों के बीच व्यापक रूप से राष्ट्रीय कानूनों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के अनुसार बदलती हैं. आमतौर पर, तथापि, एक पेटेंट आवेदन एक या एक से अधिक आविष्कार जो नवीनता और गैर - प्रत्यक्षता जैसे प्रासंगिक पेटेंट आवश्यकताओं को पूरा करना चाहिए परिभाषित दावों को शामिल करना चाहिए.अधिकांश देशों में एक पेटेंटवाला विशेष अधिकार प्रदान करने के लिए बना रही है, का उपयोग कर, बिक्री, या अनुमति के बिना पेटेंट आविष्कार वितरण से दूसरों को रोकने का अधिकार है.
विश्व व्यापार संगठन के व्यापार से संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकार के पहलुओं पर समझौते (डब्ल्यूटीओ) के तहत पेटेंट विश्व व्यापार संगठन के सदस्य राज्यों में उपलब्ध किसी भी आविष्कार के लिए होना चाहिए प्रौद्योगिकी के सभी क्षेत्रों में, और उपलब्ध संरक्षण की अवधि कम से कम बीस साल का एक होना चाहिए . कई देशों में, कुछ विषय क्षेत्रों में व्यापार के तरीकों और कंप्यूटर प्रोग्राम के रूप में पेटेंट से बाहर रखा गया है.

पहले, देखने के लिए अगर अपने विचार उत्तीर्ण की जाँच करें.
दूसरा, पेटेंट प्रक्रिया की मूल बातें जानने के लिए.
अगले, सभी पिछले सार्वजनिक खुलासे कि अपने आविष्कार की चिंता के लिए एक खोज करते हैं.इन सार्वजनिक खुलासे पूर्व कला कहा जाता है.

पूर्व कला अपने आविष्कार से संबंधित किसी भी पेटेंट, अपने आविष्कार के बारे में किसी भी प्रकाशित लेख, और किसी भी सार्वजनिक प्रदर्शनों में शामिल हैं. यह निर्धारित करता है कि अगर आपके विचार से पहले या सार्वजनिक रूप से यह unpatentable खुलासा पेटेंट दिया गया है.
एक पंजीकृत पेटेंट वकील या एजेंट के लिए पूर्व कला के लिए एक पेटेंट खोज, और का एक बड़ा हिस्सा है कि अमेरिका और विदेशी पेटेंट है कि अपने आविष्कार के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए खोज रहा है करने के लिए किराए पर लिया जा सकता है. एक आवेदन के बाद दायर की है, यूएसपीटीओ सरकारी परीक्षा की प्रक्रिया के हिस्से के रूप में अपने स्वयं के पेटेंट खोज का संचालन करेंगे.

अन्वेषक जो विचार है या इस प्रकार है कि आइडिया लागू करता कौन है? लागू करने के लिए विचार - एक अन्वेषक है - अगर कुछ लोगों को शामिल तो वे भी प्रर्वतक के रूप में जोड़ने के लिए किया जा सकता है!

अन्य: एक विघटनकारी नवाचार एक नवीनता है कि एक नए बाजार और मूल्य नेटवर्क बनाने में मदद करता है, और अंततः पर चला जाता है एक मौजूदा बाजार मूल्य और नेटवर्क (पर कुछ साल या दशकों) को बाधित करने के लिए, एक पहले प्रौद्योगिकी अवधि नवाचारों कि तरीके है कि बाजार की उम्मीद नहीं है आम तौर पर नए बाजार में उपभोक्ताओं के अलग सेट के लिए डिजाइन द्वारा उत्पाद या सेवा में सुधार का वर्णन करने के लिए व्यापार और प्रौद्योगिकी साहित्य में और बाद में मौजूदा बाजार में कीमतों को कम करने के द्वारा प्रयोग किया जाता है .
विघटनकारी नवाचार के विपरीत, एक बनाए रखने के नवाचार नए बाजारों या मूल्य नेटवर्क नहीं बना करता है, लेकिन न केवल बेहतर मूल्य के साथ मौजूदा वालों को विकसित, फर्मों के भीतर एक दूसरे को बनाए रखने के सुधार के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करने के लिए अनुमति देता है. कायम रखना नवाचारों हो सकता है !
शब्द "विघटनकारी प्रौद्योगिकी" व्यापक रूप से किया गया है "विघटनकारी नवाचार" के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता है, लेकिन बाद अब पसंद किया जाता है, क्योंकि बाजार में विघटन करने के लिए आमतौर पर एक समारोह में अपने बदलते आवेदन की बल्कि प्रौद्योगिकी के ही नहीं होना पाया गया है. कायम रखना नवाचारों को आम तौर पर प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नवाचारों, जबकि विघटनकारी नवाचारों पूरे बाजार को बदलने के लिए. उदाहरण के लिए, ऑटोमोबाइल एक क्रांतिकारी तकनीकी नवाचार था, लेकिन यह एक विघटनकारी नवाचार नहीं था, क्योंकि जल्दी ऑटोमोबाइल महंगी लक्जरी आइटम कि घोड़ा वाहनों के लिए बाजार बाधित नहीं किया था, परिवहन के लिए अनिवार्य रूप से बाजार में कम कीमत फोर्ड मॉडल टी के कैरियर की शुरुआत तक बरकरार 1908 में बने रहे. ऑटोमोबाइल बड़े पैमाने पर उत्पादन एक विघटनकारी नवाचार था, क्योंकि यह परिवहन बाजार बदल गया. ऑटोमोबाइल, स्वयं के द्वारा नहीं था..............


पेटेंट क्या है? पेटेंट ------------------, एक कानूनी दस्तावेज़ सरकार द्वारा दी गई एक आविष्कारक अनन्य बनाने के लिए, का उपयोग करने के लिए, और साल के एक निर्धारित संख्या के लिए एक आविष्कार को बेचने का अधिकार दे रही है. पेटेंट भी पहले से आविष्कार वस्तुओं पर महत्वपूर्ण सुधार के लिए उपलब्ध हैं.
पेटेंट प्रणाली का लक्ष्य अन्वेषकों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें देने के विशेष अधिकारों के लिए उनके आविष्कार से लाभ द्वारा प्रौद्योगिकी के राज्य अग्रिम है. किताबें, फिल्में, और कला का काम करता है, नहीं पेटेंट कर सकते हैं, लेकिन सुरक्षा के कॉपीराइट के कानून के तहत इस तरह के आइटम के लिए उपलब्ध है. पेटेंट कानून बड़ा कानूनी बौद्धिक संपदा है, जो भी ट्रेडमार्क और कॉपीराइट कानून के रूप में जाना जाता है क्षेत्र की एक शाखा है.
पेटेंट कानून केन्द्रों नवीनता और आविष्कारशील कदम (या प्रत्यक्षता की कमी) की अवधारणा दौर.सही है जो वे समझौते के लिए पेटेंट की अवधि के लिए आविष्कार का उपयोग करने से सभी है, लेकिन दूसरों को न सिर्फ एक ही विचार की भी स्वतंत्र devisors imitators को रोकने के लिए है. पेटेंट की विशेष क्षमता के हिसाब से है कि यह अपने उत्पाद और सेवाओं में आविष्कार के किसी भी रूप को शामिल करने से दूसरों को रोकने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. पेटेंट इस प्रकार अपने प्रतियोगियों के लिए गंभीर कठिनाइयों का बन गया है. यह है क्यों पेटेंट सभी औद्योगिक सुधार के लिए आसानी से उपलब्ध है, लेकिन न केवल क्या कर रहे हैं एक patentable आविष्कार के रूप में अर्हता प्राप्त करने के लिए न्याय किया है.
क्या patentable है?
एक पेटेंट के लिए अर्हता प्राप्त करने के लिए, आविष्कार तीन बुनियादी परीक्षण को पूरा करना होगा.सबसे पहले, यह उपन्यास हो सकता है, जिसका अर्थ है कि आविष्कार नहीं किया
पहले से मौजूद हैं. दूसरा, आविष्कार गैर स्पष्ट होना चाहिए, जिसका अर्थ है कि आविष्कार मौजूदा प्रौद्योगिकी के लिए एक महत्वपूर्ण सुधार होना चाहिए. पहले से ज्ञात उपकरणों में साधारण परिवर्तन एक patentable आविष्कार शामिल नहीं है. अंत में, प्रस्तावित आविष्कार उपयोगी होना चाहिए.कानूनी विशेषज्ञों सामान्यतः इस व्याख्या का मतलब है कि कोई पेटेंट हो जाएगा
आविष्कार है कि केवल एक अवैध या अनैतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है के लिए दी गई है.
खोजों के कुछ प्रकार patentable नहीं हैं. कोई भी प्रकृति के एक कानून या एक वैज्ञानिक सिद्धांत पर एक पेटेंट प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं यहां तक ​​कि अगर वह या वह पहले यह पता चलता है एक है. उदाहरण के लिए, आइजैक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के नियमों पर एक पेटेंट नहीं प्राप्त किया है, सकता है और अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के लिए अपने सूत्र का पेटेंट नहीं कराया जा सकता है, E = mc2.
यूरोपीय पेटेंट कन्वेंशन (ईपीसी) के कानून के तहत, पेटेंट ही आविष्कार जो औद्योगिक आवेदन, जो नए हैं और जो एक आविष्कारशील कदम शामिल करने में सक्षम हैं के लिए दिया जाता है. एक आविष्कार एक तकनीकी समस्या को हल करने के लिए एक विचार के व्यावहारिक कार्यान्वयन के लिए एक प्रस्ताव के रूप में परिभाषित किया जा सकता है. एक आविष्कार औद्योगिक आवेदन करने में सक्षम है अगर यह या बनाया जा सकता है उद्योग के किसी भी प्रकार में इस्तेमाल किया सहित कृषि, के रूप में विशुद्ध रूप से बौद्धिक या सौंदर्य गतिविधि से अलग,.
एक आविष्कार के लिए नया हो अगर, दाखिल करने की तारीख से पहले या प्राथमिकता ही आविष्कार के लिए एक पहले आवेदन से आवेदन करने के लिए दी दिनांक, यह पहले से ही किसी भी रूप में (लिखित, मौखिक या के माध्यम से जनता के लिए नहीं जाना जाता था कहा जाता है ) का उपयोग करने के लिए, यह कला के राज्य का हिस्सा यानी फार्म नहीं था. एक आविष्कार करने के लिए एक आविष्कारशील कदम शामिल अगर, क्या पहले से ही जनता के लिए जाना जाता है के प्रकाश में, यह एक तथाकथित कुशल व्यक्ति, अच्छा ज्ञान और क्षेत्र के अनुभव के साथ यानी किसी के लिए स्पष्ट नहीं है कहा जाता है.
भारतीय पेटेंट कानून के तहत एक पेटेंट एक आविष्कार है जो नए और उपयोगी है के लिए ही प्राप्त किया जा सकता है. आविष्कार एक मशीन, लेख, या निर्माण, या एक लेख के निर्माण की प्रक्रिया के द्वारा उत्पादित पदार्थ से संबंधित होना चाहिए. पेटेंट भी एक लेख या निर्माण की एक प्रक्रिया के एक सुधार के लिए प्राप्त किया जा सकता है. दवा या नशीली दवाओं और रसायनों के कुछ वर्गों के संबंध में कोई पदार्थ ही यहां तक ​​कि अगर नई पेटेंट के लिए दी जाती है, लेकिन निर्माण की एक प्रक्रिया है और
पदार्थ patentable है. एक पेटेंट के लिए आवेदन सच हो सकता है और पहली आविष्कारक या व्यक्ति जो उसे खिताब प्राप्त किया गया है, सही लिए एक पेटेंट आबंटित होने के लिए आवेदन करना चाहिए.


मैं अपने विचार पेटेंट?

अन्वेषक जो विचार है या इस प्रकार है कि आइडिया लागू करता कौन है? को बदलने के लिए जिस तरह से हम रहते हैं, काम करते हैं, खेलते हैं.
प्रभाव में विचारों को बारी.
एक प्रर्वतक बन जाते हैं.
हम मानते हैं कि छात्रों को अगली पीढ़ी नवीन आविष्कारों हो सकता है जब वे अभ्यास में अपने विचारों को रखा सीखना होगा.
हमें विश्वास है कि नवीनता सबसे अच्छा दूरदर्शी सोच के माध्यम से और अनुभव, अंतःविषय सहयोग हाथों पर पढ़ाया जा रहा है, और जोखिम लेने.
हम कक्षा और कार्यशालाओं, coursework और सलाह, परीक्षण और त्रुटि के बीच संतुलन कायम करने में विश्वास करते हैं.
काटने बढ़त कार्यक्रम और पाठ्यक्रम, गतिविधियों, और कई विषयों में कार्यशालाओं के लिए नवाचार को बढ़ावा भीतर विकसित किया है. इसके अलावा, हम विकसित किया है और व्याख्यानों और कार्यशालाओं छात्र नवीन आविष्कारों के रूप में के रूप में अच्छी तरह से छात्र समूहों की मदद करने के लिए अपने विचारों का आदान प्रदान करने के उद्देश्य से की पहचान.

हम अधिक पाठ्यक्रम के विकास की प्रक्रिया में अभी भी कर रहे हैं, कृपया रहने tuned.
 
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वहाँ अक्सर (नई चीजें वास्तव में होता करने की क्षमता) नवाचार और रचनात्मकता (मूल विचार है / कुछ करने का एक अलग तरह से देखते हैं की क्षमता) के बीच भ्रम की स्थिति हो जाता है.
रचनात्मकता की सोच रही है, नवाचार कार्यान्वयन है.
अपने काम के दिन के लिए दिन के जीवन में नए होने के नाते उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए एक निश्चित तरीका है और एक फास्ट ट्रैक आगे पर अपने कैरियर को बढ़ावा देने. स्थिति que के साथ जारी रखने के लिए एक सुरक्षित विकल्प की तरह लगता है, लेकिन लंबे समय में यह बाहर बारी के लिए वहाँ बाहर हो रही है और नई चीजों की कोशिश या नए उत्पादों, दृष्टिकोण, प्रक्रियाओं या सेवाओं बनाने की तुलना में अधिक जोखिम भरा हो जाएगा. यदि आप परिवर्तन नहीं करते हैं तो आप यकीन है कि किसी और है कि किसी और जल्द ही कर सकते हैं अपने आविष्कार प्रयासों के माध्यम से आगे ले जा सकता है.
/ नवाचार और रचनात्मकता के लिए एक और अच्छा कारण है कि लोगों को अक्सर अपने तत्व में जब रचनात्मक या रचनात्मक विचारों को लागू करने जा रहा है. समय से मक्खियों, आप की तरह वहाँ दिन में पर्याप्त समय नहीं लगेगा, आप ऊर्जा के विशाल मात्रा है और तुम बिस्तर से बाहर कूद सुबह में क्रम में करने के लिए अपने आविष्कार परियोजना पर काम करने के लिए प्राप्त होगा.
हमारी आशा है कि आप इस साइट को अधिक रचनात्मक होने में सहायता और आप नवाचार प्रक्रिया के अधिक समझ पाने में मदद कर सकते हैं.





यदि एक से अधिक व्यक्ति एक नवाचार पर काम करता है, जो प्रर्वतक है? ------------- सब कर रहे हैं!


वहाँ किसी विशेष शिक्षा एक प्रर्वतक होना आवश्यक है? ---------- नहीं!




           आविष्कार सोच क्या है?
 
आविष्कार सोच के बारे में सोच रहा है कि आप क्या देख सकते से परे चला जाता है. यह कल्पनाशील है.यह स्पष्ट परे देखने की क्षमता है. यह रचनात्मक है और यह अलग है. एक आविष्कार
विचारक साधारण कुछ को देखो और असाधारण अन्वेषकों, लोगों, espialey धारावाहिक नवीन आविष्कारों के एक विशेष समूह कर सकते हैं. वे परवाह नहीं है दूसरों को क्या लगता है. वे सब उनके विचारों के बारे में है और कमाल की बात है कि लोगों की मदद या जीवन के रास्ते बदल जाएगा बनाने हैं. अन्वेषकों के बिना हम मुसीबत का एक बहुत में होगा. यह आविष्कार कि हमें बातें हम हर रोज इस्तेमाल में लाया है कागज पिन से लैपटॉप या टैब है. आविष्कार हमारे रोजमर्रा के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण हैं.
 
आविष्कार सोच एक उपहार है. स्पष्ट परे जाने के लिए सक्षम होने के नाते कुछ नहीं है
हर कोई कर सकता है. कुछ लोगों को स्वाभाविक रूप से इस उपहार के साथ पैदा होते हैं, जबकि दूसरों को अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षित करने के लिए बॉक्स के बाहर सोचने के लिए सक्षम होने के लिए काम करना है. कई गंभीर अन्वेषकों बार एक बिट तितर बितर मान रहे हैं, लेकिन सिर्फ यह है कि क्योंकि वे अपने काम पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं कि वे के बारे में सब कुछ भूल जाते हैं. यह हो सकता है क्योंकि वे पागल या पागल नहीं है. आविष्कार सोच एक उच्च संरचित प्रक्रिया नहीं है. वहाँ यह करने के लिए कोई नियम नहीं है, वास्तव में कर रहे हैं.
 
अधिकांश नवाचार अव्यवस्था और गड़बड़ी से आता है, कई लोगों को मिथक है कि नवीनता महंगा है और प्रौद्योगिकी शामिल है विश्वास करते हैं. यह संभव है, आज की उच्च तकनीक की दुनिया में भी, आविष्कार विचार है कि प्रौद्योगिकी की आवश्यकता नहीं है. सबसे अच्छा आविष्कार की कोई तकनीक शामिल है. वे सरल कर रहे हैं और वे काम करते हैं. आप अपने निपटान में वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की एक टीम है जीवन के लिए आविष्कार विचारों को लाने की जरूरत नहीं है.
 
बस याद है आप एक आविष्कार विचारक बनने के लिए कुंजी पकड़. तुम अपने मन को बहुत कुछ करने की अनुमति के लिए कुंजी पकड़ो.

अगस्त्य
 








क्या तुमने कभी सुपर रचनात्मक या आविष्कार लोगों को देखा है, और महसूस किया कि वे विशेष उपहार के साथ ही धन्य प्राणी हैं? क्या आपने महसूस किया है कि आप के रूप में भाग्यशाली नहीं हैं?मैं इस तरह से महसूस करने के लिए इस्तेमाल किया. मैं जब से सीखा है कि रचनात्मकता बुद्धि से मनोविज्ञान के बारे में अधिक है, और वहाँ रचनात्मक किया जा रहा है के लिए कोई रहस्य हैं. वास्तव में, वहाँ कोई अधिक रचनात्मक किया जा रहा है ", तो आप पहले से ही एक रचनात्मक किया जा रहा हैं जैसी कोई चीज नहीं है.
मुझे यकीन है कि हम सभी क्षणों से संबंधित हैं जब हम फंस हमारी अपनी रचनात्मकता में नल की कोशिश कर महसूस किया जा सकता है. क्या आप जानते हैं कि इस ब्लॉक केवल काम पर अपने मन है? अपने मन मान्यताओं, आत्म लगाया बाधाओं और खुद को सीमित संकोच के सभी प्रकार पैदा कर रही है. मैंने पाया है कि हम सिर्फ क्षण में जा रहा द्वारा इन मान्यताओं को दूर कर सकते हैं, कर रही शुरू, और सोच को रोकने के.


1. हठ - आविष्कार सिर्फ महान विचारों से अधिक शामिल है. हम विश्वास, कठिन काम करने की जरूरत है और अंतिम परिणाम के लिए एक लेजर तेज ध्यान के लिए हमारी दृष्टि के लिए बाधाओं का सामना करने में persisting रखना. हम विस्मय में एक रचनात्मक विचार के अंत परिणाम को देखने के लिए जाते हैं, लेकिन क्या हम कार्रवाई, कड़ी मेहनत और दृश्य के पीछे दृढ़ता दृष्टि एक वास्तविकता बनाने नहीं दिख रहा है.
"आविष्कार 1% प्रेरणा, 99% पसीना"
थॉमस ए एडीसन
2. निकालें स्व - सीमित संकोच - निषेध के जादू के तहत, हम सीमित और अटक लग रहा है. हम मान्यताओं और प्रतिबंध हटाने से इन मन बनाया बाधाओं से खुद को मुक्त करने की जरूरत है. यह है कि हम क्या उल्लेख है जब हम कहते हैं "बॉक्स से बाहर लगता है. विश्वासों सीमित सेटिंग के बिना खुद को प्रोत्साहित करने के लिए नए विचारों और समाधान के लिए खुला हो. याद रखें, नवाचार बुद्धि से मनोविज्ञान के बारे में अधिक है.
3. जोखिम लेते हैं, गलतियाँ - मेरा मानना ​​है कि कारण है कि हम आत्म लगाया निषेध बनाने की है कि हिस्सा विफलता के डर की वजह से है. उम्मीद है कि कुछ विचारों को सीखने की प्रक्रिया में विफल हो जाएगा. प्रोटोटाइप अक्सर गठन उन लोगों पर बाहर का परीक्षण करने के लिए, प्रतिक्रिया इकट्ठा, और वृद्धिशील परिवर्तन करना. बल्कि विफलताओं के रूप में गलतियों के इलाज से प्रयोग के रूप में उनमें से लगता है. "प्रयोग की उम्मीद करने के लिए जानबूझकर कुछ जानने के लिए विफलता है." (स्कॉट Berkun). विफलताओं के लिए अपने आप को दंडित करने के बजाय, उन्हें स्वीकार करते हैं, तो आपके newfound ज्ञान लेने और यह सबसे अच्छा समाधान खोजने की दिशा में डाल दिया. सबसे अच्छा परिणाम के उत्पादन के अपने लक्ष्य के लिए रहते हैं, लेकिन हम समझते हैं आप जिस तरह से अपने साथ बाधाओं हिट हो सकता है.
"मैं असफल नहीं है. मैं सिर्फ 10,000 तरीके कि काम नहीं करेगा पाया है. "
थॉमस ए एडीसन
4. Escape - हमारे पर्यावरण करता है और प्रभाव कैसे हम महसूस करते हैं. अधिक आराम और शांत हम आंतरिक रूप से, अधिक ग्रहणशील हम हमारे बह रचनात्मकता में नल हैं. यह है क्यों विचारों बौछार में कभी कभी हमारे पास आते हैं या जब हम अकेले हैं. हम में से प्रत्येक हमारे रचनात्मक ऊर्जा का उपयोग करने के लिए अलग से चलाता है. मैं अपने खाने की मेज पर चाय का एक कप गर्म के साथ बैठने से 'रचनात्मक' क्षेत्र में जाओ, और मेरे शोर रद्द headphones. कई महान विचारकों लंबी सैर पर जाने के लिए उन्हें समस्याओं को हल करने में मदद करते हैं. प्रयोग और पाते हैं क्या आप के लिए काम करता है.
5. बातें लिखने के नीचे - कई नवीन आविष्कारों और रचनात्मक लोगों को एक पत्रिका रखने के लिए विचारों और विचारों को संक्षेप में लिख. कुछ एक स्केच बुक, स्क्रैप बुक बाद यह नोट, ढीले कागज रखने. वे सब एक के लिए अपने विचारों पर कब्जा करने के लिए, कागज पर लगता है, उनके संकोच छोड़ देता है और रचनात्मक प्रक्रिया शुरू करने का तरीका है. लियोनार्डो दा विंसी की प्रसिद्ध notebookwas 30.8 मिलियन डॉलर के लिए बिल गेट्स द्वारा खरीदा.



6. पैटर्न खोजने और युग्म बनाएँ - दूसरे के विचारों से विचार आते हैं. क्या आप जानते हैं कि एडीसन 1 एक जो प्रकाश बल्ब का आविष्कार के साथ आया नहीं था? वह एक गिलास बल्ब के अंदर एक व्यावहारिक कार्बन फिलामेंट, कि प्रकाश बल्ब पिछले अब बनाने के लिए पहली बार था. आप नए विचारों के लिए अपने जोखिम को बढ़ाने के लिए, पैटर्न के लिए देखो और देखो कि कैसे आप विचारों गठबंधन मौजूदा समाधान पर सुधार कर सकते हैं कर सकते हैं.
7. जिज्ञासा - कई नवीन आविष्कारों बस उत्सुक लोग हैं, जो जिज्ञासु हैं, और समस्याओं को हल करने के लिए. चीजों को अलग तरीके से देखकर अभ्यास. उदाहरण के लिए, जब एक समस्या का समाधान देखकर, खुद से पूछते हैं, "ऐसा करने के लिए कुछ वैकल्पिक तरीके क्या हैं?". सवालों की एक बहुत से पूछो और मानदंडों या मौजूदा तरीकों को चुनौती.


 
कानूनी नोटिस:
 
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