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Wednesday, May 10, 2017

बुद्ध की मृत्यु .....

 बुद्ध एक गांव में ठहरे थे। और उस गांव के एक शुद्र ने,एक गरीब आदमी ने बुद्ध को निमंत्रण दिया की मेरे घर भोजन करो। भगवान ने उसका निमंत्रण स्‍वीकार कर लिया। सुबह-सुबह जल्‍दी आ गया था। वह जानता था उसका नम्‍बर बाद में तो नहीं आ पायेगा। इससे पहले और लोग निमंत्रण न दे वह बहुत सुबह उठ भगवान की गंध कुटी के सामने आ बैठा। उस की बड़ी तमन्‍ना थी की जीवन में एक बार भगवान उसके यहाँ भी भोजन ग्रहण करे।

वह निमंत्रण दे ही रहा था कि इतनी देर में गांव को कोई धन पति ने आकर भगवान को कहा कि आज का भोजन निमंत्रण मेरे ग्रहण करें। भगवान बुद्ध ने कहा धनपति आज का तो निमंत्रण आ चुका है। इस प्रेमी ने आज अपने घर बुलाया हे। उस अमीर ने उस आदमी की तरफ देखा और कहां, इस का निमंत्रण, शायद इस के पास तो अपने खाने के लिए भी कुछ नहीं होगा। इसके तो खुद कई-कई फाँकें पड़े होते है। तब उसने उसकी तरफ देख कर उससे पूछा क्‍या में कुछ गलत कहा रहा हूं। उस व्‍यक्‍ति ने गर्दन हिला कर हामी भर दी। इस के पास कुछ तो खिलाने के लिए होगा तभी तो यह इतनी दुर से मुझे निमंत्रण देने के लिए आया है। जो भी हो इसके पास जो भी होगा अब निमंत्रण तो इसी का स्‍वीकार कर चूका हूं। और इसी के घर भोजन करूंगा। जाओ ग्रह पति आप भोजन की तैयारी करो आज का भोजन आपके यहाँ है।

भगवान बुद्ध गये। उस आदमी को भरोसा भी न था कि भगवान उसके घर पर भी कभी भोजन ग्रहण करेने के लिए आएँगे। उसके पास कुछ भी न था खिलाने को वस्‍तुत:। वह अमीर ठीक कह रहा था। रूखी रोटिया थीं। सब्‍जी के नाम पर बिहार में गरीब किसान वह जो बरसात के दिनों में कुकुरमुत्‍ते पैदा हो जाते है—लकड़ियों पर, गंदी जगह में—उस कुकुरमुत्‍ते को इकट्ठा कर लेते है। सुखाकर रख लेते है। और उसी की सब्‍जी बनाकर खाते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि कुकुरमुत्‍ते पायजनस हो जाता है। जहरीला हो जाता है। सांप वगैरा के गुजरने के कारण। वह ऐसी जगह पैदा हो गये हो जहां जहर मिल गया। तो कुकुरमुत्‍तों में जहर था।

बुद्ध के लिए उसने कुकुरमुत्‍ते की सब्‍जी बनाई। वह एक दम कड़वे जहर थे। मुंह में रखना मुश्‍किल था। लेकिन उसके पास एक ही सब्‍जी थी। तो भगवान बुद्ध ने यह सोच कर कि अगर मैं कहूं कि यह सब्‍जी कड़वी हे। तो यह कठिनाई में पड़ेगा; उसके पास कोई दूसरी सब्‍जी नहीं है। वह उस ज़हरीली सब्‍जी को खा गये। उसे मुंह में भी रखना कठिन था। पूरी को मांग कर की बहुत सुस्‍वाद बनी है। कह कर खा गये ताकि इसे बाद में भी पता न चले कि यह ज़हरीली सब्‍जी थी। खूब आनंद ले कर खाते रहे।

जैसे ही भगवान बुद्ध वहां से निकले, उस आदमी ने जब सब्‍जी को चखा तो वह तो हैरान हो गया। यह क्‍या यह तो कड़वी जहर सब्‍जी है। वह भागा हुआ आया और उसने कहा कि आप क्‍या करते रहे? वह तो जहर है। वह छाती पीटकर कर रोने लगा। लेकिन बुद्ध भगवान ने कहा, तू जरा भी चिंता मत कर। क्‍योंकि जहर मेरा अब कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगा। क्‍योंकि मैं उसे जानता हूं जो अमृत है। तू जरा भी चिंता मत कर घर जा।

लेकिन फिर भी उस आदमी की चिंता तो हम समझ सकते है। कि उससे अनजाने में क्‍या हो गया उसे अंदरूनी तोर पर कितनी गिलानि पीड़ा पश्‍चाताप हो रहा होगा कि उसने ये कर दिया। पर उस आदमी को भगवान ने कहां तू धन्‍य भागी है। तुझे पता नहीं, तू खुश हो, तू सौभाग्‍यशाली है। क्‍योंकि कभी हजारों वर्षों में बुद्ध जैसा व्‍यक्‍ति पैदा होता है। दो ही व्‍यक्‍तियों को उसका सौभाग्‍य मिलता हे। पहला भोजन कराने का अवसर उसकी मां को मिलता है और अंतिम भोजन कराने का अवसर तुझे मिला है। तू सौभाग्‍यशाली है; तू आनंदित हो। ऐसा फिर सैकड़ों हजारों वर्षों में कभी कोई बुद्ध पैदा होगा और ऐसा अवसर फिर किसी को मिलेगा। उस आदमी को किसी तरह समझा-बूझकर लौटा दिया।

बुद्ध के शिष्‍यों ने जीवन वैद्य को बुला कर जब पता कराया की भगवान की तबीयत क्‍यों खराब रहती है। तब उसने बताया कि इन्‍हें जहर दिया गया है। तब भगवान के अन्‍य भिक्षुओं के साथ आनंद रोने लगा। की वह आदमी तो हत्‍यारा है, उसने आपको जहर दिया है। भगवान ने कहा: ऐसी बात भूल कर भी मत कहना। अन्‍यथा उस आदमी को कोई जीवित नहीं रहने देगा। आनंद तुम गांव में लोगों को भेज कर यह डोंडी पिटवां दो ये खबर करवा दो की दो ही आदमी परम सौभाग्‍यशाली होते है, जिसने पहला भोजन बुद्ध को कराया और जिसने अंतिम भोजन बुद्ध को कराया।

मरने के वक्‍त तक सब लोग यही कहते रहे की आप एक बार तो कहा देते की यह सब्‍जी कड़वी है विषाक्‍त है। तब हम पर यह वज्रपात अकस्‍मात न गिरता। आपने भी यह क्‍या किया। और भगवान केवल मुस्कुराए और कहने लगे जानते है। यह तो निमित है कैसे जाना कोई तो बहाना होना ही था। यह वज्रपात गिरना तो था ही, इससे क्‍या फर्क पड़ता है कैसे गिरा। जहां तक मेरा संबंध है मुझ पर कोई वज्रपात नहीं गिरा क्‍योंकि मैने उसे जान लिया है जो अमृत हे। जिसकी कोई मृत्‍यु नहीं होती।

   अनूभवी अज्ञानी .....

Sunday, March 19, 2017

मृत्यू , Death, ....

मृत्यु के बारे में क्या कहा जाए? मृत्यु के संबंध में कुछ कैसे कहा जा सकता है? कोई भी शब्द मृत्यु के आशय को बता नहीं सकता। इस शब्द मृत्यु का क्या अर्थ है? उसका कोई अर्थ नहीं है।जब आप शब्द मृत्यु का प्रयोग करते हैं तो उसका क्या अर्थ होता है? वह सिर्फ एक द्वार है जिसके पार क्या होता है हम नहीं जानते। हम एक आदमी को द्वार में विलीन होते देखते हैं। हम केवल द्वार तक देखते हैं, उसके बाद वह आदमी बस खो जाता है। तुम्हारा शब्द 'मृत्यु' सिर्फ द्वार का अर्थ बता सकता है, लेकिन वास्तव में द्वार के पार क्या होता है? क्योंकि द्वार ही वह बात नहीं है।

द्वार से गुजरना होता है , फिर जो द्वार से गुजरता है उसका क्या होता है जिसे हम नहीं देख सकते?  क्या होता है उसका? और यह द्वार क्या है? केवल सांस का रुक जाना? क्या सांस ही पूरा जीवन है? क्या तुम्हारे पास सांस से अधिक कुछ नहीं है? सांस रुकती है, शरीर गलता है, यदि तुम सिर्फ शरीर और सांस ही हो तो कोई हर्ज नहीं है। फिर मृत्यु कुछ भी नहीं है, वह किसी की ओर द्वार नहीं है। वह सिर्फ रुक जाना है , विलीन होना नहीं है। यह घड़ी की भांति है। 

घड़ी चल रही है, टिक-टिक कर रही है, फिर वह रुक जाती है। तुम यह नहीं पूछते कि टिक-टिक कहां गई? वह निरर्थक होगा। वह कहीं नहीं गई है। वह कहीं नहीं गई है, वह सिर्फ रुक गई है। वह एक यंत्र था और यंत्र में कुछ खराबी आ गई। तुम यंत्र को ठीक कर सकते हो, फिर वह दुबारा टिक-टिक करेगी। क्या मृत्यु सिर्फ घड़ी का रुक जाना है? बस यूं ही?

यदि ऐसा है तो वह रहस्य नहीं है, वस्तुत: यह कुछ  भी नहीं है। लेकिन जीवन इतनी  आसानी से कैसे विलीन हो सकता है? जीवन यांत्रिक नहीं है, जीवन एक सजगता है। घड़ी सजग नहीं है। तुम टिक-टिक सुन सकते हो, घड़ी कभी नहीं सुन सकती। तुम अपनी स्वयं की धड़कन को सुन सकते हो। यह सुननेवाला कौन है? यदि धड़कन ही एकमात्र जीवन है तो यह सुननेवाला कौन है?  यदि सांस ही कुल जीवन है तो तुम अपनी सांस के प्रति सजग कैसे हो सकते हो? इसलिए पूरब की सभी  ध्यान-विधियां सांस की सजगता को एक सूक्ष्म विधि की तरह इस्तेमाल करती हैं… क्योंकि यदि तुम सांस के प्रति सजग हो तो फिर यह सजगता कौन है? वह सांस के पार होनी चाहिए। वह सांस के पार कुछ होनी चाहिए क्योंकि तुम उसे देख सकते हो और देखनेवाला विषय नहीं हो सकता। तुम उसके साक्षी हो सकते हो। तुम आंखें बंद करके अपनी सांस को आती-जाती देख सकते हो। यह देखनेवाला, यह साक्षी कौन है? यह कोई अलग शक्ति होनी चाहिए  जो सांस के ऊपर निर्भर नहीं है। जब सांस रुक जाती है तब वह घड़ी का रुक जाना है, लेकिन यह सजगता कहां जाती है? यह सजगता किस तल पर जाती है?

Death is a door, it is not a stopping. Awareness moves but your body remains at the door  just as you have come here and left your shoes at the door. The body is left outside the temple, and your awareness enters the temple. It is the most subtle phenomenon, life is nothing before it. Basically life is just a preparation for dying, and only those are wise who learn in their life how to die. If you dont know how to die you have missed the whole meaning of life: it is a preparation, it is a training, it is a discipline.

Life is not the end, it is just a discipline to learn the art of dying. But you are afraid, you are scared, at the very word death you start trembling. That means you have not yet known life, because life never dies. Life cannot die. 
  
कहीं न कहीं तुमने शरीर के साथ, यंत्र के साथ तादात्म्य कर लिया है। यंत्र को मरना ही है, यंत्र शाश्वत नहीं हो सकता क्योंकि यंत्र कई चीजों पर निर्भर करता है। वह संस्कारित घटना है। सजगता बेशर्त है, वह किसी चीज पर निर्भर नहीं करती। वह आकाश में बादल की तरह तैर सकती है। उसकी कोई जड़ें नहीं हैं। वह अजन्मा है इसलिए वह कभी मर नहीं सकती।

मृत्यु एक झूठ है—सरासर झूठ—जो न कभी हुआ, न कभी हो सकता है। जो है, वह सदा है। रूप बदलते हैं। रूप की बदलाहट को तुम मृत्यु समझ लेते हो। तुम किसी मित्र को स्टेशन पर विदा करने गए; उसे गाड़ी में बिठा दिया। नमस्कार कर ली। हाथ हिला दिया। गाड़ी छूट गयी। क्या तुम सोचते हो, यह आदमी मर गया? तुम्हारी आंख से ओझल हो गया। अब तुम्हें दिखायी नहीं पड़ रहा है। लेकिन क्या तुम सोचते हो, यह आदमी मर गया? बच्चे थे, फिर तुम जवान हो गए। बच्चे का क्या हुआ? बच्चा मर गया? अब तो बच्चा कहीं दिखायी नहीं पड़ता! जवान थे, अब के हो गए। जवान का क्या हुआ? जवान मर गया?  जवान अब तो कहीं दिखायी नहीं पड़ता! सिर्फ रूप बदलते हैं। बच्चा ही जवान हो गया। जवान ही बूढ़ा हो गया। और कल जीवन ही मृत्यु हो जाएगा।

यह सिर्फ रूप की बदलाहट है। दिन में तुम जागे थे, रात सो जाओगे। दिन और रात एक ही चीज के रूपांतरण हैं। जो जागा था, वही सो गया। बीज में वृक्ष छिपा है। जमीन में डाल दो, वृक्ष पैदा हो जाएगा। जब तक बीज में छिपा था, दिखायी नहीं पड़ता था। मृत्यु में तुम फिर छिप जाते हो, बीज में चले जाते हो। फिर किसी गर्भ में पड़ोगे; फिर जन्म होगा। और गर्भ में नहीं पड़ोगे, तो महाजन्म होगा, तो मोक्ष में विराजमान हो जाओगे। मरता कभी कुछ भी नहीं। विज्ञान भी इस बात से सहमत है। विज्ञान कहता है. किसी चीज को नष्ट नहीं किया जा सकता।

एक रेत के छोटे से कण को भी वितान की सारी क्षमता के बावजूद हम नष्ट नहीं कर सकते। पीस सकते हैं, नष्ट नहीं कर सकते। रूप बदलेगा पीसने से तो। रेत को पीस दिया, तो और पतली रेत हो गयी। उसको और पीस दिया, तो और पतली रेत हो गयी। हम उसका अणु विस्फोट भी कर ‘सकते हैं। लेकिन अणु टूट जाएगा, तो परमाणु होंगे। और पतली रेत हो गयी। हम परमाणु को भी तोड़ सकते हैं, तो फिर इलेक्ट्रान, न्द्वान, पाजिट्रान रह जाएंगे। और पतली रेत हो गयी! मगर नष्ट कुछ नहीं हो रहा है। सिर्फ रूप बदल रहा है। विज्ञान कहता है पदार्थ अविनाशी है।

विज्ञान ने पदार्थ की खोज की, इसलिए पदार्थ के अविनाशत्व को जान लिया। धर्म कहता है – चेतना अविनाशी है, क्योंकि धर्म ने चेतना की खोज की और चेतना के अविनाशत्व को जान लिया। विज्ञान और धर्म इस मामले में राजी हैं कि जो है, वह अविनाशी है। मृत्यु है ही नहीं। तुम पहले भी थे; तुम बाद में भी होओगे। और अगर तुम जाग जाओ, अगर तुम चैतन्य से भर जाओ, तो तुम्हें सब दिखायी पड़ जाएगा जो—जो तुम पहले थे। सब दिखायी पड जाएगा, कब क्या थे। बुद्ध ने अपने पिछले जन्मों की कितनी कथाएं कही हैं! तब ऐसा था। तब ऐसा था। तब वैसा था। कभी जानवर थे; कभी पौधा थे, कभी पशु थे; कभी पक्षी। कभी राजा, कभी भिखारी। कभी स्त्री, कभी पुरुष। बुद्ध ने बहुत कथाएं कही हैं। वह जो जाग जाता है, उसे सारा स्मरण आ जाता है। मृत्यु तो होती ही नहीं। मृत्यु तो सिर्फ पर्दे का गिरना है। तुम नाटक देखने गए। पर्दा गिरा। क्या तुम सोचते हो, मर गए सब लोग जो पर्दे के पीछे हो गए! वे सिर्फ पर्दे के पीछे हो गए।

अब फिर तैयारी कर रहे होंगे। मूंछ इत्यादि लगाएंगे; दाढ़ी वगैरह लगाएंगे, लीप—पोत करेंगे। फिर पर्दा उठेगा। शायद तुम पहचान भी न पाओ कि जो सज्जन थोड़ी देर पहले कुछ और थे, अब वे कुछ और हो गए हैं! तब वे बिना मूंछ के थे; अब वे मूंछ लगाकर आ गए हैं। शायद तुम पहचान भी न पाओ। बस, यही हो रहा है। इसलिए संसार को नाटक कहा है, मंच कहा है। यहां रूप बदलते रहते हैं। यहां राम भी रावण बन जाते हैं और रावण भी राम बन जाते हैं। ये पर्दे के पीछे तैयारियां कर आते हैं। फिर लौट आते हैं, बार—बार लौट आते हैं। तुम पूछते हो ‘मृत्यु क्या है?’ मृत्यु है ही नहीं। मृत्यु एक भांति है। एक धोखा है।

सब था पहले ऐसा ही। फिर—फिर ऐसा ही होगा। यह दुनिया मिट जाएगी, तो दूसरी दुनिया पैदा होगी। यह पृथ्वी उजड़ जाएगी, तो दूसरी पृथ्वी बस जाएगी। तुम इस देह को छोड़ोगे, तो दूसरी देह में प्रविष्ट हो जाओगे। तुम इस चित्तदशा को छोड़ोगे, तो नयी चित्तदशा मिल जाएगी। तुम अज्ञान छोड़ोगे, तो ज्ञान में प्रतिष्ठित हो जाओगे; मगर मिटेगा कुछ भी नहीं। मिटना होता ही नहीं। सब यहां अविनाशी है। अमृत इस अस्तित्व का स्वभाव है। मृत्यु है ही नहीं। इसलिए मजबूरी है, तुम्हारे प्रश्न का उत्तर न दे सकूंगा कि मृत्यु क्या है? क्योंकि जो है ही नहीं, उसकी परिभाषा कैसे करें! जो है ही नहीं, उसकी व्याख्या कैसे करें?

ऐसा ही है, जैसे तुमने रास्ते पर पड़ी रस्सी में भय के कारण सांप देखा। भागे। घबडाए। फिर कोई मिल गया, जो जानता है कि रस्सी है। उसने तुम्हारा हाथ पकड़ा और कहा. मत घबड़ाओ, रस्सी है। तुम्हें ले गया; पास जाकर दिखा दी कि रस्सी है। फिर क्या तुम उससे पूछोगे सांप का क्या हुआ? नहीं; तुम नहीं पूछोगे कि सांप का क्या हुआ? बात खतम हो गयी, साप था ही नहीं। क्या हुआ का सवाल नहीं है। क्या तुम उससे पूछोगे अब जरा सांप के संबंध में समझाइए! वह जो सांप मैंने देखा था, वह क्या था? वह तुम्हारी भ्रांति थी। वह बाहर कहीं था ही नहीं। रस्सी के रूप—रंग ने तुम्हें भ्रांति दे दी, सांझ के धुंधलके ने तुम्हें भ्रांति दे दी, तुम्हारे भीतर के भय ने तुम्हें भांति दे दी। सारी भ्रांतियों ने मिलकर एक सांप निर्मित कर दिया। वह तुम्हारा सपना था। मृत्यु तुम्हारा सपना है। कभी घटा नहीं। घटता मालूम होता है। और इसलिए भ्रांति मजबूत बनी रहती है कि जो आदमी मरता है, वह तो विदा हो जाता है। वही जानता है कि क्या है मृत्यु जो मरता है।

तुम तो मर नहीं रहे। तुम बाहर से खड़े देख रहे हो। एक डाक्टर मुझे मिलने आए थे। वे कहने लगे मैंने सैकड़ों मृत्युएं देखी हैं। मैंने कहा – गलत बात मत कहो। तुमने मरते हुए लोग देखे होंगे, मृत्युएं कैसे देखोगे? मृत्यु तुम कैसे देखोगे? तुम तो अभी जिंदा हो! तुमने सैकडों मरते हुए लोग देखे होंगे, लेकिन मरते हुए लोग देखने से क्या होता है! तुम क्या देखोगे बाहर? यही देख सकते हो कि इसकी सांस धीमी होती जाती है; कि धड़कन डूबती जाती है। मगर यह थोड़े ही मृत्यु है। यह आदमी अब ठंडा हो गया, यही देखोगे। मगर इसके भीतर क्या हुआ? इसके भीतर जो चेतना थी, कहां गयी? उसने कहां पंख फैलाए? वह किस आकाश में उड गयी? वह किस द्वार से प्रविष्ट हो गयी? किस गर्भ में बैठ गयी? वह कहां गयी? क्या हुआ? उसका तो तुम्हें कुछ भी पता नहीं है।

वह तो वही आदमी कह सकता है। और मुर्दे कभी लौटते नहीं। जो मर गया, वह लौटता नहीं। और जो लौट आते हैं, उनकी तुम मानते नहीं। जैसे बुद्ध यही कह रहे हैं कि मैंने ध्यान में वह सारा देख लिया जो मौत में देखा जाता है। इसलिए तो ज्ञानी की कब को हम समाधि कहते हैं, क्योंकि वह समाधि को जानकर मरा। उसने ध्यान की परम दशा जानी। इसलिए तुमने देखा. हम संन्यासी को जलाते नहीं, गड़ाते हैं। शायद तुमने सोचा ही न हो कि क्यों! गृहस्थ को जलाते हैं, संन्यासी को गड़ाते हैं। क्यों? क्योंकि गृहस्थ को अभी फिर पैदा होना है। उसकी देह जल जाए, यह अच्छा। क्योंकि देह के जलते ही उसकी आत्मा की जो आसक्ति इस देह में थी, वह मुक्त हो जाती है। जब जल ही गयी; खतम ही हो गयी, राख हो गयी—अब इसमें मोह रखने का क्या प्रयोजन है? वह उड़ जाता है। वह नए गर्भ में प्रवेश करने की तैयारी करने लगता है। पुराना घर जल गया, तो नया घर खोजता है।