Monday, March 20, 2017

Buddha, बुद्ध .....

पहली, गौतम बुद्ध दार्शनिक नहीं, द्रष्टा हैं।:   

दार्शनिक वह, जो सोचे। द्रष्टा वह, जो देखे। सोचने से दृष्टि नहीं मिलती। सोचना अज्ञात का हो भी नहीं सकता। जो ज्ञात नहीं है, उसे हम सोचेंगे भी कैसे? सोचना तो ज्ञात के भीतर ही परिभ्रमण है। सोचना तो ज्ञात की ही धूल में ही लोटना है। सत्य अज्ञात है। ऐसे ही अज्ञात है जैसे अंधे को प्रकाश अज्ञात है। अंधा लाख सोचे, लाख सिर मारे, तो भी प्रकाश के संबंध में सोचकर क्या जान पाएगा! आंख की चिकित्सा होनी चाहिए। आंख खुली होनी चाहिए। अंधा जब तक द्रष्टा न बनें, तब तक सार हाथ नहीं लगेगा।

तो पहली बात बुद्ध के संबंध में स्मरण रखना, उनका जोर द्रष्टा बनने पर है। वे स्वयं द्रष्टा हैं। और वे नहीं चाहते कि लोग दर्शन के ऊहापोह में उलझें।
दार्शनिक ऊहापोह के कारण ही करोड़ों लोग दृष्टि को उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। प्रकाश की मुफ्त धारणाएं मिल जाएं, तो आंख का महंगा इलाज कौन करे! सस्ते में सिद्धान्त मिल जाएं, तो सत्य को कौन खोजे! मुफ्त, उधार सब उपलब्ध हो, तो आंख की चिकित्सा की पीड़ा से कौन गुजरे! और चिकित्सा कठिन है। और चिकित्सा में पीड़ा भी है।बुद्ध ने बार-बार कहा है कि मैं चिकित्सक हूं। उनके सूत्रों को समझने में इसे याद रखना। बुद्ध किसी सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं कर रहे हैं।

वे किसी दर्शन का सूत्रपात नहीं कर रहे हैं। वे केवल उन लोगों को बुला रहे हैं जो अंधे हैं और जिनके भीतर प्रकाश को देखने की प्यास है। और जब लोग बुद्ध के पास गए, तो बुद्ध ने उन्हें कुछ शब्द पकड़ाए, बुद्ध ने उन्हें ध्यान की तरफ इंगित और इशारा किया। क्योंकि ध्यान से है खुलती आंख, ध्यान से खुलती है भीतर की आंख।विचारों से तो पर्त की पर्त तुम इकट्ठी कर लो, आंख खुली भी हो तो बंद हो जाएगी। विचारों के बोझ से आदमी की दृष्टि खो जाती है। जितने विचार के पक्षपात गहन हो जाते हैं, उतना ही देखना असंभव हो जाता है। फिर तुम वही देखने लगते हो जो तुम्हारी दृष्टियां होती है। फिर तुम वह नहीं देखते, जो है। जो है, उसे देखना हो तो सब दृष्टियों से मुक्त हो जाना जरूरी है।इस विरोधाभास को खयाल में लेना, दृष्टि पाने के लिए सब दृष्टियांे से मुक्त हो जाना जरूरी है। जिसकी कोई भी दृष्टि नहीं, जिसका कोई दर्शनशास्त्र नहीं, वही सत्य को देखने में समर्थ हो पाता है।
गौतम बुद्ध पारंपरिक नही, मौलिक हैं।: 

गौतम बुद्ध किसी परंपरा, किसी लीक को नहीं पीटते हैं। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि अतीत के ऋषियों ने ऐसा कहा था, इसलिए मान लो। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि वेद में ऐसा लिखा है, इसलिए मान लो। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि मैं कहता हूं, इसलिए मान लो। वे कहते हैं, जब तक तुम न जान लो, मानना मत। उधार श्रद्धा दो कौड़ी की है। विश्वास मत करना, खोजना। अपने जीवन को खोज में लगाना, मानने में जरा भी शक्ति व्यय मत करना। अन्यथा मानने में ही फांसी लग जाएगी। मान-मानकार ही लोग भटक गए हैं।

तो बुद्ध न तो परंपरा की दुहाई देते, न वेद की। न वे कहते हैं कि हम जो कहते हैं, वह ठीक होना ही चाहिए। वे इतना ही कहते हैं, ऐसा मैंने देखा। इसे मानने की जरूरत नहीं है। इसको अगर परिकल्पना की तरह ही स्वीकार कर लो, तो काफी है।परिकल्पना का अर्थ होता है, हाइपोथीसिस। जैसे कि मैंने कहा कि भीतर आओ, भवन में दीया जल रहा है। तो मैं तुमसे कहता हूं कि यह मानने की जरूरत नहीं है कि भवन में दीया जल रहा है। इसको विश्वास करने की जरूरत नहीं। इस पर किसी तरह की श्रद्धा लाने की जरूरत नहीं है। तुम मेरे साथ आओ और दीए को जलता देख लो। दीया जल रहा है तो तुम मानो या न मानो, दीया जल रहा है। और दीया जल रहा है तो तुम मानते हुए आओ कि न मानते हुए आओ, दीया जलता ही रहेगा। तुम्हारे न मानने से दीया बुझेगा नहीं, तुम्हारे मानने से जलेगा नहीं।

इसलिए बुद्ध कहते हैं, तुम सिर्फ मेरा निमंत्रण स्वीकार करो। इस भवन में दीया जला है, तुम भीतर आओ। और यह भवन तुम्हारा ही है, यही तुम्हारी ही अंतरात्मा का भवन है। तुम भीतर आओ और दीए को जलता देख लो। देख लो, फिर मानना।
और खयाल रहे जब देख ही लिया तो मानने की कोई जरूरत नहीं रह जाती है। हम जो देख लेते हैं, उसे थोड़े ही मानते हैं। हम तो जो नहीं देखते, उसी को मानते हैं। तुम पत्थर-पहाड़ को तो नहीं मानते, परमात्मा को मानते हो। तुम सूरज-चांद-तारों को तो नहीं मानते, वे तो हैं। तुम स्वर्गलोक, मोक्ष, नर्क को मानते हो। जो नहीं दिखाई पड़ता, उसको हम मानते हैं। जो दिखायी पड़ता है, उसको तो मानने की जरूरत ही नहीं रह जाती है, उसका यथार्थ तो प्रगट है।
तो बुद्ध कहते हैं, मेरी बात पर भरोसा लाने की जरूरत नहीं, इतना ही काफी है कि तुम मेरा निमंत्रण स्वीकार कर लो। इतना पर्याप्त है। इसको वैज्ञानिक कहते हैं, हाइपोथीसिस, परिकल्पना। एक वैज्ञानिक कहता है, सौ डिग्री तक पानी गर्म करने से पानी भाप बन जाता है। मानने की कोई जरूरत नहीं, चूल्हा तुम्हारे घर में है, जल उपलब्ध है, आग उपलब्ध है, चढ़ा दो चूल्हे पर जल को, परीक्षण कर लो। परीक्षण करने के लिए जो बात मानी गयी है, वह परिकल्पना। अभी स्वीकार नहीं कर ली है कि यह सत्य है, लेकिन एक आदमी कहता है, शायद सत्य हो, शायद असत्य हो, प्रयोग करके देख लें, प्रयोग ही सिद्ध करेगा-सत्य है या नहीं?
तो बुद्ध पारंपरिक नहीं हैं, मौलिक हैं। विचार की परंपरा होती है, दृष्टि की मौलिकता होती है। विचार अतीत के होते हैं, दृष्टि वर्तमान में होती है। विचार दूसरों के होते हैं, दृष्टि अपनी होती है।
गौतम बुद्ध शास्त्रीय नहीं हैं। पंडित नहीं हैं, वैज्ञानिक हैं। :

बुद्ध ने धर्म को पहली दफे वैज्ञानिक प्रतिष्ठा दी। बुद्ध ने धर्म को पहली दफे विज्ञान के सिंहासन पर विराजमान किया। इसके पहले तक धर्म अंधविश्वास था। बुद्ध ने उसे बड़ी गरिमा दी। बुद्ध ने कहा, अंधविश्वास की जरूरत ही नहीं है। धर्म तो जीवन का परम सत्य है। एस धम्मो सनंतनो। यह धर्म तो शाश्वत और सनातन है। तुम जब आंख खोलोगे तब इसे देख लोगे।
इसलिए बुद्ध ने यह नहीं कहा कि नरक के भय के कारण मानो, और यह भी नहीं कहा कि स्वर्ग के लोभ के कारण मानो। और इसलिए यह भी नहीं कहा कि परमात्मा सताएगा अगर न माना, और परमात्मा पुरस्कार देगा अगर माना। नही, ये सब व्यर्थ की बातें बुद्ध ने नहीं कहीं।
बुद्ध ने तो सारसूत्र कहा। बुद्ध ने तो कहा, यह धर्म तुम्हारा स्वभाव है। यह तुम्हारे भीतर बह रहा है, अहर्निश बह रहा है। इसे खोजने के लिए आकाश में आंखें उठाने की जरूरत नहीं है, इसे खोजने के लिए भीतर जरा सी तलाश करने की जरूरत है। यह तुम हो, तुम्हारी नियति है, यह तुम्हारा स्वभाव है। एक क्षण को भी तुमने इसे खोया नहीं, सिर्फ विस्मरण हुआ है।

तो बुद्ध ने चैतन्य की सीढ़ियां कैसे पार की जाएं, मूर्छा से कैसे आदमी अमूर्छा में जाए, बेहोशी कैसे टूटे और होश कैसे जगे, इसका विज्ञान थिर किया। और जो उनके साथ भीतर गए, उन्हें निरपवाद रूप से मान लेना पड़ा कि बुद्ध जो कहते हैं, ठीक कहते हैं।
यह अपूर्व क्रांति थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। बुद्ध मील के पत्थर हैं मनुष्य-जाति के इतिहास में। संत तो बहुत हुए, मील के पत्थर बहुत थोड़े लोग होते हैं। महावीर भी मील के पत्थर नहीं हैं। क्योंकि महावीर ने जो कहा, वह तेईस तीर्थंकर पहले कह चुके थे। कृष्ण भी मील के पत्थर नहीं हैं। क्योंकि कृष्ण ने जो कहा, वह उपनिषद और वेद सदा से कहते रहे थे। बुद्ध मील के पत्थर हैं, जैसे लाओत्सू मील का पत्थर है। कभी-कभार, करोड़ों लोगों में एकाध संत होता है, करोड़ों संतों में एकाध मील का पत्थर होता है। मील के पत्थर का अर्थ होता है, उसके बाद फिर मनुष्य-जाति वही नहीं रह जाती। सब बदल जाता है, सब रूपांतरित हो जाता है। एक नयी दृष्टि और एक नया आयाम और एक नया आकाश बुद्ध ने खोल दिया।

बुद्ध के साथ धर्म अंधविश्वास न रहा, अंतर्खोज बना। बुद्ध के साथ धर्म ने बड़ी छलांग लगा ली। आस्तिक को ही धर्म में जाने की सुविधा न रही, नास्तिक को भी सुविधा हो गयी। ईश्वर को नहीं मानते, कोई हर्ज नहीं, बुद्ध कहते ही नहीं कि मानना जरूरी है। कुछ भी नहीं मानते, बुद्ध कहते हैं, तो भी कोई चिंता की बात नहीं। कुछ मानने की जरूरत ही नहीं है। बिना कुछ माने अपने भीतर तो जा सकते हो। भीतर जाने के लिए मानने की आवश्यकता क्या है! न तो ईश्वर को मानना है, न आत्मा को मानना है, न स्वर्ग-नर्क को मानना है। इसे तो नास्तिक भी इनकार न कर सकेगा कि मेरा भीतर है। इसे तो नास्तिकों ने भी नहीं कहा है कि भीतर नहीं है। भीतर तो है ही। नास्तिक कहते हैं, यह भीतर शाश्वत नहीं है। बुद्ध कहते हैं, फिकर छोड़ो, पहले यह जितना है उसे जान लो, उसी जानने से अगर शाश्वत का दर्शन हो जाए तो फिर मानने की जरूरत न होगी; तुम मान ही लोगे।
बुद्ध ने नास्तिकों को धार्मिक बनाने का महत कार्य पूरा किया। इसलिए बुद्ध के पास जो लोग आकर्षित हुए, बड़े बुद्धिमान लोग थे। आमतौर से धार्मिक साधु-संतों के पास बुद्धिहीन लोग इकट्ठे होते हैं। जड़, मूर्छित, मुर्दा। बुद्ध ने मनुष्य-जाति की जो श्रेष्ठतम संभावनाएं हैं, उनको आकर्षित किया। बुद्ध के पास नवनीत इकट्ठा हुआ चैतन्य का। ऐसे लोग इकट्ठे हुए जो और किसी तरह तो धर्म को मान ही नहीं सकते थे, उनके पास प्रज्वलित तर्क था। इसलिए बुद्ध दार्शनिक हैं, लेकिन बुद्ध के पास इस देश के सबसे बड़े से बड़े दार्शनिक इकट्ठे हो गए। बुद्ध अकेले एक व्यक्ति के पीछे इतना दर्शनशास्त्र पैदा हुआ, जितना मनुष्य-जाति के इतिहास में किसी दूसरे व्यक्ति के पीछे नहीं हुआ। और बुद्ध के पीछे इतने महत्वपूर्ण विचारक हुए कि जिनकी तुलना सारी पृथ्वी पर कहीं भी खोजनी मुश्किल है।
कैसे यह घटित हुआ? बुद्ध ने महानास्तिकों को आकर्षित किया। आस्तिक को बुला लेना मंदिर में तो कोई खास बात नहीं, नास्तिक को बुला लेने में कुछ खास बात है। बुद्ध वैज्ञानिक हैं, इसलिए नास्तिक भी उत्सुक हुआ। विज्ञान को तो नास्तिक ठुकरा न सकेगा। बुद्ध ने कहा, संदेह है, चलो, संदेह की ही सीढ़ी बनाएंगे। संदेह से और शुभ क्या हो सकता है! संदेह के पत्थर को लेंगेी बना लेंगेे। संदेह से ही तो खोज होती है। इसलिए संदेह को फेंको मत।
इस बात को समझना। जिसके पास जितनी विराट दृष्टि होती है, उतना ही वह हर चीज का उपयोग कर लेना चाहता है। सिर्फ क्षुद्र दृष्टि के लोग काटते हैं। क्षुद्र दृष्टि का आदमी कहेगा, संदेह नहीं चाहिए, श्रद्धा चाहिए। काटो संदेह को। लेकिन संदेह तुम्हारा जीवंत अंग है, काटोगे तो तुम अपंग हो जाओगे। संदेह का रूपांतरण होना चाहिए, खंडन नहीं। संदेह ही श्रद्धा बन जाए, ऐसी कोई प्रक्रिया होनी चाहिए।
कोई कहता है, काटो कामवासना को। लेकिन काटने से तो तुम अपंग हो जाओगे। कुछ ऐसा होना चाहिए कि कामवासना राम की वासना बन जाए। ऊर्जा का अधोगमन ऊर्ध्वगमन बन जाए। तुम ऊर्ध्वरेतस बन जाओ। कुछ ऐसा होना चाहिए कि तुम्हारे कंकड़-पत्थर भी हीरों में रूपांतरित हो जाएं। कुछ ऐसा होना चाहिए कि तुम्हारे जीवन की कीचड़ कमल बन सके।बुद्ध ने वह कीमिया दी।
गौतम बुद्ध वायवी, एब्सट्रेक्ट नहीं, अत्यंत व्यावहारिक हैं।

ऊंचे से ऊंची छलांग ली है उन्होंने, लेकिन पृथ्वी को कभी नहीं छोड़ा। जड़ें जमीन में जमाए रखीं। वह सिर्फ हवा में ही पंख नहीं मारते रहे।
एक बहुत प्राचीन कथा है कि ब्रह्मा ने जब सृष्टि बनायी और सब चीजें बनायीं, तभी उसने यथार्थ और स्वप्न भी बनाया। बनते ही झगड़ा शुरू हो गया। यथार्थ और स्वप्न का झगड़ा तो प्राचीन है। पहले दिन ही झगड़ा शुरू हो गया। यथार्थ ने कहा, मैं श्रेष्ठ हूं; स्वप्न ने कहा, मैं श्रेष्ठ हूं, तुझमे रखा क्या है! झगड़ा यहां तक बढ़ गया कि कौन महत्वपूर्ण है दोनों में कि दोनों झगड़ते हुए ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा हंसे और उन्होंने कहा, ऐसा करो, सिद्ध हो जाएगा प्रयोग से। तुममें से जो भी जमीन पर पैर गड़ाए रहे और आकाश को छूने में समर्थ हो जाए, वही श्रेष्ठ है।
दोनों लग गये। स्वप्न ने तो तत्क्षण आकाश छू लिया, देर न लगी, लेकिन पैर उसके जमीन तक न पहुंच सके। टंग गया आकाश में। हाथ तो लग गए आकाश से, लेकिन पैर जमीन से न लगे-स्वप्न के पैर होते ही नहीं। यथार्थ जमीन में पैर गड़ाकर खड़ा हो गया, जैसे कि कोई वृक्ष हो, लेकिन ठूंठ की तरह, आकाश तक उसके हाथ न पहुंचे।
ब्रह्मा ने कहा, समझे कुछ? स्वप्न अकेला आकाश में अटक जाता है, यथार्थ अकेला जमीन पर भटक जाता है। कुछ ऐसा चाहिए कि स्वप्न और यथार्थ का मेल हो जाए।
तो बुद्ध वायवी नहीं हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उन्होंनें आकाश नहीं छुआ। उन्होंने आकाश छुआ, लेकिन यथार्थ के आधार पर छुआ।
इस फर्क को समझना।
बुद्ध ने अपने पैर तो जमीन पर रोके, बुद्ध ने यथार्थ को तो जरा भी नहीं भुलाया, यथार्थ में बुनियाद रखी; भवन उठा, मंदिर ऊंचा उठा, मंदिर पर स्वर्णकलश चढ़े। लेकिन मंदिर के स्वर्णकलश टिकते तो जमीन में छिपे हुए पत्थरों पर हैं, भूमि के भीतर छिपे हुए बुनियाद के पत्थरों पर टिकते हैं। बुद्ध ने एक मंदिर बनाया, जिसमें बुनियाद भी है और शिखर भी।
बहुत लोग हैं, जिनको हम नास्तिक कहते हैं, वे जमीन पर अटके रह जाते हैं। वे ठूंठ की तरह हैं। यथार्थ का ठूंठ। मार्क्सवादी हैं या चार्वाकवादी हैं, वे यथार्थ का ठूंठ। वे जमीन में तो पैर गड़ा लेते हैं, लेकिन उनके भीतर आकाश तक उठने की कोई अभीप्सा नहीं है, आकाश तक उठने की कोई क्षमता नहीं है। और चूंकि वे सपने को काट डालते हैं बिलकुल और कह देते हैं, आदर्श है ही नहीं जगत में। बस यही सब कुछ है, मिट्टी ही सब कुछ है। उनके जीवन में कमल नहीं फूलता, कमल नहीं उठता। कमल का उपाय ही नहीं रह जाता। जिसको इनकार कर दिया आग्रहपूर्वक, उसका जन्म नहीं होता।
और फिर दूसरी तरफ सिद्धांतवादी हैं: एब्सट्रेक्ट, वायवी विचारक है; वे आकाश में ही पर मारते रहते हैं, वे कभी जमीन पर पैर नहीं रोकते हैं। वे आदर्श में जीते हैं, यथार्थ से उनका कभी कोई मिलन ही नहीं होता। उनकी आंखों में आकाश-कुसुम खिलते हैं, असली कुसुम नहीं।
बुद्ध स्वप्नवादी नहीं हैं, परम व्यावहारिक हैं। लेकिन चार्वाक जैसे व्यवहारवादी भी नहीं हैं। उनका व्यवहारवाद अपने भीतर आदर्श की संभावना छिपाए हुए है। लेकिन वे कहते हैं, शुरू तो करना होगा जमीन पर पैर टेकने से। जिसके पैर जमीन में जितनी मजबूती से टिके हैं, वह उतनी ही आसानी से आकाश को छूने में समर्थ हो पाएगा। मगर यात्रा तो शुरू करनी पड़ेगी जमीन में पैर टेकने से।
इसलिए जब कोई बुद्ध के पास आता है और ईश्वर की बात पूछता है, वे कहते हैं, व्यर्थ की बातें मत पूछो। अनेकों को तो लगा कि बुद्ध अनीश्वरवादी हैं, इसलिए ईश्वर के बाबत जवाब नहीं देते। यह बात सच नहीं है। बुद्ध कहते हैं, पहले जमीन में तो पैर गड़ा लो, पहले ध्यान में तो उतरो, पहले अंतस चेतना में तो जड़ें फैला लो, पहले तुम जो हो उसको तो पहचान लो, फिर यह पीछे हो लेगा। यह अपने से हो लेगा। यह एक दिन अचानक हो जाता है। जब जमीन में वृक्ष की जड़े खूब मजबूती से रुक जाती हैं, तो वृक्ष अपने आप आकाश की तरफ उठने लगता है। एक दिन आकाश में उठे वृक्ष में फूल भी खिलते हैं, वसंत भी आता है। मगर वह अपने से होता है। असली बात जड़ की है।
तो बुद्ध बहुत गहरे में यथार्थवादी हैं, लेकिन उनका यथार्थ आदर्श को समाहित किए हुए है। वह आदर्श समन्वित है यथार्थ में।

गौतम बुद्ध विधिवादी नहीं, मानवीय हैं।:

एक तो विधिवादी होता है, जैसे मनु। सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, मनुष्य महत्वपूर्ण नहीं है। ऐसा लगता है मनु में, जैसे मनुष्य सिद्धांत के लिए बना है। मनुष्य की आहुति चढ़ायी जा सकती है सिद्धांत के लिए, लेकिन सिद्धांत में फेर-बदल नहीं की जा सकती।
बुद्ध अति मानवीय हैं, ह्ययूमनिस्ट। मानववादी हैं। वे कहते हैं, सिद्धांत का उपयोग है मनुष्य की सेवा में तत्पर हो जाना। सिद्धांत मनुष्य के लिए है, मनुष्य सिद्धांत के लिए नहीं। इसलिए बुद्ध के वक्तव्यों में बड़े विरोधाभास हैं। क्योंकि बुद्ध एक-एक व्यक्ति की मनुष्यता को इतना मूल्य देते, इतना चरम मूल्य देते हैं कि अगर उन्हें लगता है इस आदमी को इस सिद्धांत से ठीक नहीं पड़ेगा, तो वे सिद्धांत बदल देते हैं। अगर उन्हें लगता है कि थोड़े से सिद्धांत में फर्क करने से इस आदमी को लाभ होगा, तो उन्हें फर्क करने में जरा भी झिझक नहीं होती। लेकिन मौलिक रूप से ध्यान उनका व्यक्ति पर है, मनुष्य पर है। मनुष्य परम है। मनुष्य मापदंड है। सब चीजें मनुष्य पर कसी जानीं चाहिए।

इसलिए बुद्ध वर्ण-व्यवस्था को न मान सके। इसलिए बुद्ध आश्रम-व्यवस्था को भी न मान सके। क्योंकि ये जड़ सिद्धांत हैं। बुद्ध ने कहा, ब्राह्मण वही जो ब्रह्म को जाने। ब्राह्मण-घर में पैदा होने से कोई ब्राह्मण नहीं होता। और शूद्र वही जो ब्रह्म न जाने। शूद्र-घर में पैदा होने से कोई शूद्र नहीं होता। तो अनेक ब्राह्मण शूद्र हो गए, बुद्ध के हिसाब से, और अनेक शूद्र बाह्मण हो गए। सब अस्तव्यस्त हो गया। मनु के पूरे शास्त्र को बुद्ध ने उखाड़ फेंका।
हिंदू अब तक भी बुद्ध से नाराजगी भूले नहीं हैं। वर्ण-व्यवस्था को इस बुरी तरह बुद्ध ने तोड़ा। यह कुछ आकस्मिक बात नहीं थी कि डाक्टर अंबेडकर ने ढाई हजार साल बाद फिर शूद्रों को बौद्ध होने को निमंत्रण दिया। इसके पीछे कारण है। अंबेडकर ने बहुत बातें सोची थीं। पहले उसने सोचा कि ईसाई हो जाएं, क्योंकि हिंदुओ ने तो सता डाला है, तो ईसाई हो जाएं। फिर सोचा कि मुसलमान हो जाएं। लेकिन यह कोई बात जमीं नही, क्योंकि मुसलमानों में भी वही उपद्रव है। वर्ण के नाम से न होगा तो शिया-सुन्नी का है।
अंततः अंबेडकर की दृष्टि बुद्ध पर पड़ी और तब बात जंच गयी अंबेडकर को कि शूद्र को सिवाय बुद्ध के साथ और कोई उपाय नहीं है। क्योंकि शूद्र के लिए भी अपने सिद्धांत बदलने को अगर कोई आदमी राजी हो सकता है तो वह गौतम बुद्ध हैं-और कोई राजी नहीं हो सकता-जिसके जीवन में सिद्धांत का मूल्य ही नहीं, मनुष्य का चरम मूल्य है।
यह आकस्मिक नहीं है कि अंबेडकर बौद्ध हुए। पच्चीस सौ साल के बाद शूद्रों का फिर बौद्धत्व की तरफ जाना, या बौद्धत्व के मार्ग की तरफ जाना, बौद्ध होने की आकांक्षा, बड़ी सूचक है। इससे बुद्ध के संबंध में खबर मिलती है।
बुद्ध ने वर्ण की व्यवस्था तोड़ दी और आश्रम की व्यवस्था भी तोड़ दी। जवान, युवकों को संन्यास दे दिया। हिंदू नाराज हुए। संन्यस्त तो आदमी होता है आखिरी अवस्था में, मरने के करीब। अगर बचा रहा, पचहत्तर साल के बाद उसे संन्यस्त होना चाहिए। तो पहले तो पचहत्तर साल तक लोग बचते नहीं। अगर बच गए, तो पचहत्तर साल के बाद ऊर्जा नहीं बचती जीवन में। तो हिंदुओं का संन्यास एक तरह का मुर्दा संन्यास है, जो आखिरी घड़ी में कर लेना है। मगर इसका जीवन से कोई बहुत गहरा संबंध नहीं है।
बुद्ध ने युवकों को संन्यास दे दिया, बच्चों को संन्यास दे दिया और कहा कि यह बात मूल्यवान नहीं है, लकीर के फकीर होकर चलने से कुछ भी न चलेगा। अगर किसी व्यक्ति को युवावस्था में भी परमात्मा को खोजने की, सत्य को खोजने की, जीवन के यथार्थ को खोजने की प्रबल आकांक्षा जगी है, तो मनु महाराज का नियम मानकर रुकने की कोई जरूरत नहीं है। वह अपनी आकांक्षा को सुने, वह अपनी आकांक्षा से जाए। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आंकाक्षा को सुने। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आकांक्षा से जीए। उन्होंनें सब सिद्धांत एक अर्थ में गौण कर दिए, मनुष्य प्रमुख हो गया।
तो वे सैद्धांतिक नहीं हैं, विधिवादी नहीं हैं। लीगल नहीं है उनकी पकड़, उनकी पकड़ मानवीय है। कानून इतना मूल्यवान नहीं है, जितना मनुष्य मूल्यवान है। और हम कानून बनाते ही इसीलिए हैं कि मनुष्य के काम आए। मनुष्य कानून के काम आने के लिए नहीं है। इसलिए जब जरूरत हो, कानून बदला जा सकता है। जब मनुष्य के हित में हो, ठीक है, जब अहित में हो जाए तोड़ा जा सकता है। जो-जो मनुष्य के अहित में हो जाए, तोड़ देना है। कोई कानून शाश्वत नहीं है, सब कानून उपयोग के लिए हैं।
गौतम बुद्ध नियमवादी नहीं है, बोधवादी हैं।

अगर बुद्ध से पूछो, क्या अच्छा है, क्या बुरा है, तो बुद्ध उत्तर नहीं देते। बुद्ध यह नहीं कहते कि यह काम बुरा है और यह काम अच्छा है। बुद्ध कहते हैं, जो बोधपूर्वक किया जाए, वह अच्छा; जो बोधहीनता से किया जाए, बुरा।
इस फर्क को खयाल में लेना। बुद्ध यह नहीं कहते कि हर काम हर स्थिति में भला हो सकता है। या कोई काम हर स्थिति में बुरा हो सकता है। कभी कोई बात पुण्य हो सकती है, और कभी कोई बात पाप हो सकती है-वही बात पाप हो सकती है, भिन्न परिस्थति में वही बात पाप हो सकती है। इसलिए पाप और पुण्य कर्मो के ऊपर लगे हुए लेबिल नहीं हैं। अभी जो तुमने किया, पुण्य है; और सांझ को दोहराओ तो शायद पाप हो जाए। भिन्न परिस्थिति।
तो फिर हमारे पास शाश्वत आधार क्या होगा निर्णय का? बुद्ध ने एक नया आधार दिया। बुद्ध ने आधार दिया-बोध, जागरूकता। इसे खयाल में लेना। जो मनुष्य जागरूकतापूर्वक कर पाए, जो भी जागरूकता में ही किया जा सके, वही पुण्य है। और जो बात केवल मूर्छा में ही की जा सके, वही पाप है। जैसे, तुम पूछो, क्रोध पाप है या पुण्य? तो बुद्ध कहते हैं, अगर तुम क्रोध जागरूकतापूर्वक कर सको, तो पुण्य है। अगर क्रोध तुम मूर्छित होकर ही कर सको, तो पाप है।
अब फर्क समझना। इसका मतलब यह हुआ कि हर क्रोध पाप नहीं होता और हर क्रोध पुण्य नहीं होता। कभी मां जब अपने बेटे पर क्रोध करती है, तो जरूरी नहीं है कि पाप हो। शायद पुण्य भी हो, पुण्य हो सकता है। शायद बिना क्रोध के बेटा भटक जाता। लेकिन इतना ही बुद्ध का कहना है, होशपूर्वक किया जाए।
मैंने एक झेन कहानी सुनी है। एक समुराई, एक क्षत्रिय के गुरु को किसी ने मार दिया। और जापान में ऐसी व्यवस्था है, अगर किसी का गुरु मार डाला जाए, तो शिष्य का कर्तव्य है कि बदला ले। और जब तक वह मारने वाले को न मार दे, तब तक चैन न ले। ये समुराई तो बड़े भयानक योद्धा होते हैं। गुरु को किसी ने मार डाला, तो उसका जो शिष्य था, वह तो सब कुछ छोड़कर बस इसी में लग गया।

दो साल बाद उसका पीछा करते-करते एक जंगल में, एक गुफा में उसको पकड़ लिया। बस उसकी छाती में छुरा भोंकने को था ही कि उस आदमी ने उस समुराई के ऊपर थूक दिया। जैसे ही उसने थूका, उसने छुरा वापस रख लिया अपनी म्यान में और वापस गुफा के बाहर निकल आया।
उस आदमी ने कहा, क्यों भाई, क्या हो गया? दो साल से मेरे पीछे पड़े हो, बमुश्किल तुम मुझे खोज पाए, मैं जंगल-जंगल भागता रहा, आज तुम्हें मिल गया, आज क्या बात हो गयी कि छुरा निकाला हुआ वापस रख लिया?

उसने कहा कि मुझे क्रोध आ गया। तुमने थूक दिया, मुझे क्रोध आ गया। मेरे गुरु का उपदेश था, मारो भी अगर किसी को, तो मूर्छा में मत मारना। तो मारने में भी कोई पाप नहीं है। लेकिन तुमने जो थूक दिया, दो साल तक मैंने होश रखा-यह तो सिर्फ एक व्यवस्था की बात थी कि गुरु को मेरे तुमने मारा तो मैं तुम्हें मार रहा था, मेरा इसमें कुछ वैयक्तिक लेना-देना नहीं था-लेकिन तुमने थूक क्या दिया मुझ पर, मैं भूल ही गया गुरु को और मेरे मन में भाव उठा कि मार डालूं इस आदमी को, इसने मेरे ऊपर थूका! मैं बीच में आ गया, मूर्छा आ गयी। अहंकार बीच में आ गया, मूर्छा आ गयी। इसलिए अब जाता हूं। अब फिर जब यह मूर्छा हट जाएगी तब सोचूंगा। लेकिन मूर्छा में कुछ किया नहीं जा सकता।
बुद्ध ने कहा है, जो तुम मूर्छा में करो, वही पाप; जो जागरूकता में करों, वही पुण्य है। यह पाप और पुण्य की बड़ी नयी व्यवस्था थी। और इसमें व्यक्ति को परम स्वतंत्रता है। कोई दूसरा तय नहीं कर सकता कि क्या पाप है, क्या पुण्य है। तुमको ही तय करना है। बुद्ध ने व्यक्ति को परम गरिमा दी।
गौतम बुद्ध असहज के पक्षपाती नहीं, सहज के उपदेष्टा हैं।

गौतम बुद्ध कहते हैं, कठिन के ही कारण आकर्षित मत होओ। क्योंकि कठिन में अहंकार का लगाव है।

इसे तुमने देखा कभी? जितनी कठिन बात हो, लोग करने को उसमें उतने ही उत्सुक होते हैं। क्योंकि कठिन बात में अहंकार को रस आता है, मजा आता है-करके दिखा दूं। अब जैसे पूना की पहाड़ी पर कोई चढ़ जाए, तो इसमें कुछ मजा नहीं है, एवरेस्ट पर चढ़ जाऊं तो कुछ बात है। पूना की पहाड़ी पर चढ़कर कौन तुम्हारी फिकर करेगा, तुम वहां लगाए रहो झंडा, खड़े रहो चढ़कर! न अखबार खबर छापेंगे, न कोई वहां तुम्हारा चित्र लेने आएगा। तुम बड़े हैरान होओगे कि फिर यह हिलेरी पर और तेनसिंग पर इतना शोरगुल क्यों मचाया गया! आखिर इन ने भी कौन सी बड़ी बात की थी, जाकर हिमालय पर झंडा गाड़ दिया था, मैंने भी झंडा गाड़ दिया! लेकिन तुम्हारी पहाड़ी छोटी है। इस पर कोई भी चढ़ सकता है। जिस पहाड़ी पर कोई भी चढ़ सकता है, उसमें अहंकार को तृप्ति का उपाय नहीं है।
तो बुद्ध ने कहा कि अहंकार अक्सर ही कठिन में और दुर्गम में उत्सुक होता है। इसलिए कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि जो सहज और सुगम है, जो हाथ के पास है, वह चूक जाता है और दूर के तारों पर हम चलते जाते हैं।
देखते हैं, आदमी चांद पर पहुंच गया। अभी अपने पर नहीं पहुंचा! तुमने कभी देखा, सोचा इस पर? चांद पर पहुंचना तकनीक की अदभुत विजय है। गणित की अदभुत विजय है। विज्ञान की अदभुत विजय है। जो आदमी चांद पर पहुँच गया, यह अभी छोटी-छोटी चीजें करने में सफल नहीं हो पाया है। अभी एक ऐसा फाउंटेनपेन भी नहीं बना पाया जो लीकता न हो। और चांद पर पहुँच गए! छोटी-सी बात भी, अभी सर्दी-जुखाम का इलाज नहीं खोज पाए, चांद पर पहुंच गए! अब ऐसे फाउंटेनपेन को बनाने में उत्सुक भी कौन है जो लीके न! छोटी-मोटी बात है, इसमें रखा क्या है!
फाउंटेनपेन सदा लीकेंगे। कोई आशा नहीं दिखती कि कभी ऐसे फाउंटेनपेन बनेंगे जो लीकें न। और सर्दी-जुखाम सदा रहेगी, इससे छुटकारे का उपाय नहीं है। क्योंकि चिकित्सक कैंसर में उत्सुक हैं, सर्दी-जुखाम में नहीं। बड़ी चीज अहंकार की चुनौती बनती है। आदमी अपने भीतर नहीं पहुंचा जो निकटतम है और चांद पर पहुंच गया। मंगल पर भी पहुंचेगा, किसी दिन और तारों पर भी पहुंचेगा, बस, अपने को छोड़कर और सब जगह पहुंचेगा।
तो बुद्ध असहजवादी नहीं हैं। बुद्ध कहते है, सहज पर ध्यान दो। जो सरल है, सुगम है, उसको जीओ। जो सुगम है, वही साधना है। इसको खयाल में लेना। तो बुद्ध ने जीवनचर्या को अत्यंत सुगम बनाने के लिए उपदेश दिया है। छोटे बच्चे की भांति सरल जीओ। साधु होने का अर्थ बहुत कठिन और जटिल हो जाना नहीं, कि सिर के बल खड़े हैं, कि खड़े हैं तो खड़े ही हैं, बैठते नहीं, कि भूखों मर रहे हैं, कि लंबे उपवास कर रहे हैं, कि कांटों की शय्या बिछाकर उस पर लेट गए हैं, कि धूप में खड़े हैं, कि शीत में खड़े हैं, कि नग्न खड़े हैं। बुद्ध ने इन सारी बातों पर कहा कि ये सब अहंकार की ही दौड़ हैं। जीवन तो सुगम है, सरल है। सत्य सुगम और सरल ही होगा। तुम नैसर्गिक बनो और अहंकार के आकर्षणों में मत उलझो।

बुद्ध ने मन को जानने-समझने पर ही सारा जोर दिया लगता है। क्या मन से मनुष्य का निर्माण होता है? आत्मा-परमात्मा की सारी बातें क्या व्यर्थ हैं?

बातें व्यर्थ हैं। अनुभव व्यर्थ नहीं। आत्मा, परमात्मा, मोक्ष शब्द की भाति, विचार की भाति दो कौड़ी के हैं। अनुभव की भांति उनके अतिरिक्त और कोई जीवन नहीं। बुद्ध ने मोक्ष को व्यर्थ नहीं कहा है, मोक्ष की बातचीत को व्यर्थ कहा है। परमात्मा को व्यर्थ नही कहा है। लेकिन परमात्मा के संबंध में सिद्धातों का जाल, शास्त्रों का जाल, उसको व्यर्थ कहा है।

मनुष्य इतना धोखेबाज है कि वह अपनी ही बातों से स्वय को धोखा देने में समर्थ हो जाता है। ईश्वर की बहुत चर्चा करते-करते तुम्हें लगता है ईश्वर को जान लिया। इतना जान लिया ईश्वर के संबंध में, कि लगता है ईश्वर को जान लिया। लेकिन ईश्वर के संबंध में जानना ईश्वर को जानना नहीं है। यह तो ऐसा ही है जैसे कोई प्यासा पानी के संबंध में सुनते-सुनते सोच ले कि पानी को जान लिया। और प्यास तो बुझेगी नहीं। पानी की चर्चा से कहीं प्यास बुझी है! परमात्मा की चर्चा से भी प्यास न बुझेगी। और जिनकी बुझ जाए, समझना कि प्यास लगी ही न थी।

तो बुद्ध कहते हैं कि अगर जानना ही हो तो परमात्मा के संबंध में मत सोचो, अपने संबंध में सोचो। क्योंकि मूलत: तुम बदल जाओ, तुम्हारी आख बदल जाए, तुम्हारे देखने का ढंग बदले, तुम्हारे बंद झरोखे खुलें, तुम्हारा अंतर्तम अंधेरे से भरा है रोशन हो, तो तुम परमात्मा को जान लोगे। फिर बात थोड़े ही करनी पड़ेगी।

ज्ञान मौन है। वह गहन चुप्पी है। फिर तुमसे कोई पूछेगा तो तुम मुस्कुराओगे। फिर तुमसे कोई पूछेगा तो तुम चुप रह जाओगे। ऐसा नहीं कि तुम्हें मालूम नहीं है, वरन अब तुम्हें मालूम है, कहो कैसे? गुंगे केरी सरकरा। कहना भी चाहोगे, जबान न हिलेगी। बोलना चाहोगे, चुप्पी पकड़ लेगी। इतना बड़ा जाना है कि शब्दों में समाता नहीं। पहले शब्दों की बात बड़ी आसान थी। जाना ही नहीं था कुछ, तो पता ही नहीं था कि तुम क्या कह रहे हो। जब तुम ईश्वर शब्द का उपयोग करते हो तो तुम कितने महत्तम शब्द का प्रयोग कर रहे हो, इसका कुछ पता न था। ईश्वर शब्द कोरा था, खाली था। अब अनुभव हुआ। महाकाश समा गया उस छोटे से शब्द में। अब उस छोटे से शब्द को मुंह से निकालना झूठा करना है। अब कहना नहीं है। अब तुम्हारा पूरा जीवन कहेगा, तुम न कहोगे।

इसलिए बुद्ध ने कहा, बात मत करो। चर्चा की बात नहीं है। पीना पड़ेगा। जीना पड़ेगा। अनुभव करना होगा। जो जानते नहीं, उनकी बात व्यर्थ है। जो जानते हैं, वे उसकी बात नहीं करते। ऐसा नहीं कि वे बात नहीं करते। बुद्ध ने बहुत बात की है। लेकिन परमात्मा के संबंध में न की। मनुष्य के संबंध में की। मनुष्य बीमारी है। परमात्मा स्वास्थ्य है। बीमारी को ठीक पहचान लो, कारण खोज लो, निदान करो, चिकित्सा हो जाने दो; जो शेष बचेगा बीमारी के चले जाने पर-मनुष्य के तिरोहित हो जाने पर तुम्हारे भीतर जो शेष रह जाएगा-वही परमात्मा है। तुम जब तक हो तब तक परमात्मा नहीं है, तुम लाख सिर पटको, तुम लाख शब्दों का संयोजन जमाओ, तुम लाख भरोसा करो। तुम्हारा भरोसा तुम्हारा ही होगा।

इसे थोड़ा समझना।

तुम कहते हो, मैं श्रद्धा करता हूं। लेकिन मैं की कहीं कोई श्रद्धा होती है! मै तो मूलत: अश्रद्धालु है। मैं संदेह है। उचित होगा कहना कि जब तक तुम हो तब तक श्रद्धा नहीं है। जब तुम न रहोगे, एक गहन सन्नाटा छा जाएगा, तुम्हारी कोई सीमा पता न लगेगी, तुम ऐसे चुप हो जाओगे जैसे कि कभी बोले ही नहीं, जैसे पत्ता भी नहीं खड़का, ऐसा गहन सन्नाटा तुम्हारे भीतर छा जाएगा; तुम नहीं रहोगे, तब तुम अचानक पाओगे, श्रद्धा के कमल खिले। श्रद्धा के साज पर गीत उठा। श्रद्धा नाची तुम्हारे भीतर। तुम्हारी मौजूदगी बाधा है।

तो बुद्ध कहते हैं, तुम्हारी चर्चा का सवाल नहीं है, तुम्हारे चुप हो जाने का सवाल है। इसलिए बुद्ध मन की बात करते हैं। मन बीमारी है, ध्यान औषधि है, परमात्मा उपलब्धि है। उपलब्धि की क्या बात करनी। मन की बीमारी को ध्यान की औषधि से मिटा देना, परमात्मा मिला ही हुआ है। बात की तो, न की तो, कोई अंतर नहीं पड़ता। जो नहीं जानते, वे बात करे तो भी क्या बात करेंगे? और जो जानते हैं, वे बात करना भी चाहें तो कैसे करेंगे? ऐसा नहीं कि बुद्ध को बात करना नहीं आता। उन जैसा कुशल बात करने वाला कभी हुआ है? शब्दों से वे खेल सकते हैं। कुशल हैं। लेकिन उनका अंतरबोध उन्हें रोकता है।

पंडित बोले चले जाते हैं। उन्हें पता नहीं, क्या कह रहे हैं। बुद्धपुरुष चुप हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है। इतने पवित्रतम को कहा कैसे जा सकता है? ओठों पर लाकर झूठा हो जाएगा। शब्द बड़े छोटे हैं। विराट को समाएंगे, समाएगा नहीं। ऐसे ही जैसे कोई मुट्ठी में आकाश को बांधने चला हो। मुट्ठी तो बंध जाएगी, आकाश बाहर हो जाएगा। ऐसे ही शब्द तो बंध जाते हैं, परमात्मा बाहर छूट जाता है। परमात्मा शब्द परमात्मा नहीं है। और तुम जो परमात्मा की रटन लगाए रखते हो उससे परमात्मा का कुछ लेना-देना नहीं है। वह तुम्हारे मन की ही बीमारी है।

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन

दिल के बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है

तुम्हें अच्छी तरह पता है। तुम्हारा स्वर्ग, तुम्हारा मोक्ष, तुम्हारा परमात्मा, इसकी हकीकत तुम्हें अच्छी तरह मालूम है। यह तुम्हारा परमात्मा कुछ भी नहीं है। सुनी हुई बातचीत है। उड़ी हुई अफवाह है। दूसरों से सुन लिया, गुन लिया, शास्त्रों से पढ़ लिया है। शब्द घुस गया है मन में, संस्कार बन गया है।

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन

और तुम भी जानते हो कि तुम्हारे स्वर्ग का क्या अर्थ है। तुम्हारे ही सपने का विस्तार है। तुम्हें पता है कि तुम्हारा परमात्मा क्या है। वह तुम्हारी ही आकाक्षाओं का पहरेदार है। तुम्हें पता है कि तुमने ये शब्द, ये सिद्धात क्यों पकड़ रखे हैं 1 क्योंकि तुम भयभीत हो, अकेले हो, डरते हो, सहारा चाहिए। झूठा ही सही।

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन

दिल के बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है

लेकिन इस अकेले में दिल को बहला लेते हैं, किसी से भर लेते हैं। तुम्हारा परमात्मा सच नहीं है। क्योंकि तुम अभी बहुत सच हो। तुम अभी जरूरत से ज्यादा यथार्थ हो। तुम उसे जगह न दोगे। तुम ही तो बाधा बने हो। तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारे और परमात्मा के बीच और कोई भी नहीं खड़ा है।

इसलिए बुद्ध कहते हैं, मन को समझो। मन यानी तुम। मन यानी मनुष्य। और जहां मन चला गया, वहा ध्यान। और जहां ध्यान, वहा परमात्मा।

तुम्हारे होने के दो ढंग हैं। एक मन और एक ध्यान। तुमने कभी खयाल किया, जब तुम बीमार होते हो, तब भी तुम ही होते हो। और जब तुम स्वस्थ होते हो, तब

भी तुम ही होते हो। तो बीमारी और स्वास्थ्य तुम्हारे दो होने के ढंग हैं। बीमारी बेचैनी है। बीमारी एक पीड़ा है। बीमारी एक दुख है, दर्द है। स्वास्थ्य एक शाति है। जैसे भटका- भूला घर लौट आया। जैसे थके-मादे को वृक्ष की छाया मिली। स्वास्थ्य सुख है। वह भी तुम्हारे होने का ढंग है।

तो एक तो तुम्हारे होने का ढंग मनुष्य है। वह यानी बीमारी, मन। और एक तुम्हारे होने का ढंग ध्यान है, स्वास्थ्य है, परमात्मा है। तुम ही जब स्वस्थ होते हो, परमात्मा हो जाते हो। तुम्हीं जब बीमार होते हो, आदमी हो जाते हो।

लहर शात है। पूरा चांद आकाश में है। झील पर कोई लहरें नहीं उठती। दर्पण बन गयी है झील, चांद पूरा का पूरा दिखायी पड़ता है। फिर हवा का एक झोंका। लहर उठ गयी। झील कंप गयी, दर्पण खंडित हो गया। चांद हजार-हजार टुकड़ो में टूट गया। झील वही है। चांद वही है। लेकिन कंपती हुई झील बीमार झील है। तुम वही हो। परमात्मा वही है। सत्य वही है। सिर्फ तुम कंप रहे हो। यह कंपते हुए चैतन्य का नाम मन है। और अकंप चैतन्य का नाम ध्यान है। जब झील चुप हो जाती है, लहर नहीं उठती, तुम शांत होते हो।

ऐसा थोड़े ही है कि शात अवस्था में परमात्मा से मिलन होता है। यह तो मन की ही बातचीत है। यह तुम साथ मत ले जाना।

इसलिए बुद्ध कहते हैं, इस चर्चा को मत चलाओ। इससे कुछ लाभ तो होता नहीं, हानि बहुत हो जाती है। इससे किसी की कुछ समझ में तो आता नहीं, नासमझी बहुत बढ़ जाती है। यह बात ही मत चलाओ। बस इतना ही कहो संक्षिप्त में, कि कैसे यह मन शात हो जाए। कैसे ये लहरें सो जाएं। कैसे झील स्वस्थ हो जाए। कैसे प्रतिबिंब बन सके परमात्मा का उसमें।

प्रतिबिंब, यह भी सब बातचीत है। लेकिन कठिनाई यह है कि किसी भी तरह से उस तरफ इशारा करो, शब्द को लाना पड़े। मगर असलियत यह है कि जब झील पूरी शात होती है तो चांद ही हो जाती है। अब इसे कैसे कहो? जब तुम पूरे शात होते हो तो परमात्मा से मिलना नहीं होता, तुम परमात्मा हो जाते हो। अशांति में तुम मनुष्य समझते हो अपने को, परमात्मा नहीं समइा पाते। कैसे समझोगे? इतनी पीड़ा में, और तुम परमात्मा! इतनी दीनता में, और तुम परमात्मा! मनुष्य दीन है। अपने को ईश्वर कैसे मानेगा। ईश्वर तो तभी मान सकता है जब जीवन में परम ऐश्वर्य प्रगट हो। जब भीतर वैभव उठे। और जब भीतर ऐसी घड़ी आए कि लगे कि सब कुछ तुम्हारा है। सब तुम हो। चांद-तारे तुम्हारे भीतर घूमते हैं। और तुम्हारे ही हाथ के इशारे से जगत चलता है। तुम इस जगत की प्राण-प्रतिष्ठा हो। तुम इसके केंद्र पर हो। तुम ऐसे ही अजनबी नहीं हो। तुम कोई बिन बुलाए मेहमान नहीं हो। तुम घर के मालिक हो। तुम मेहमान नही हो,. मेजबान हो।

झेन फकीर कहते हैं कि मनुष्य की दो अवस्थाएं हैं। एक, कि वह अपने को

अतिथि समझे, गेस्ट। और एक, कि अपने को होस्ट समझे, मेजबान। और इतना ही फर्क है। अभी दुनिया में तुम ऐसे हो जैसे जबर्दस्ती हो। अभी तुम ऐसे हो जैसे बुलाए न गए थे और आ गए हो। अभी तुम ऐसे हो जैसे एक दुश्मन हो। लड़ रहे हो। फिर एक होने का ढंग है शात। तुम लड़ नहीं रहे हो। तुम मेहमान भी नहीं हो, तुम स्वयं मेजबान हो। तुम्हें किसी ने बुलाया नहीं, तुम मालिक हो। तब तुम्हारे भीतर ऐश्वर्य प्रगट हुआ। परमात्मा प्रगट हुआ।

बुद्ध कहते हैं, तुम्हारा ईश्वर तो ऐसा है जैसे अफवाहें सुनी हों।

हस्ती का शोर तो है मगर एतबार क्या

झूठी खबर किसी की उड़ायी हुई सी है

सुनते तो बहुत हैं परमात्मा की बात।

हस्ती का शोर तो है मगर एतबार क्या

भरोसा कैसे आए? श्रद्धा कैसे हो?

झूठी खबर किसी की उड़ायी हुई सी है

यह परमात्मा एक झूठी खबर मालूम पड़ता है, जो किसी ने उड़ा दी और चल पड़ी। और एक से दूसरे के हाथ में चली जाती है। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को दे जाती है। इस पर भरोसा कैसे आए, एतबार कैसे हो?

तो बुद्ध कहते हैं, इस बात में ही मत पड़ो। परमात्मा पर एतबार नहीं लाना है। परमात्मा पर भरोसा नहीं लाना है। लाओगे भी कैसे? जिसे कभी जाना नहीं, जिसे कभी देखा नहीं, जिसे कभी सुना नहीं, जिसे कभी पहचाना नहीं, जिसका कोई संस्पर्श न हुआ, जो हृदय मे कभी विराजा नहीं, जिसकी छाया कभी तुम्हारे जीवन पर न पड़ी, उसका भरोसा कैसे करोगे?

झूठी खबर किसी की उड़ायी हुई सी है

लाख चेष्टा करके भी तो श्रद्धा जमेगी न। जमा भी लो किसी तरह, उखड़ी- उखड़ी रहेगी। और नीचे आधार तो नहीं होगा। बेबुनियाद होगी। इस बेबुनियाद श्रद्धा पर जीकर क्या तुम धार्मिक हो जाओगे, आस्तिक हो जाओगे?

अगर ऐसा ही होता तो सारी पृथ्वी आस्तिक है। हर आदमी आस्तिक है। कोई ईसाई है, कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है, कोई जैन है। पृथ्वी पर नास्तिक तो बड़े थोड़े हैं। और जो नास्तिक हैं, अगर उनको भी तुम गौर से देखो, तुम उनको भी आस्तिक ही पाओगे। बाइबिल को न मानते हों, कुरान को न मानते हों, गीता को न मानते हों, तो दास कैपिटल-मार्क्स की किताब-को मानते हैं। कृष्‍ण को न पूजते हों, महावीर को न पूजते हों, तो लेनिन को पूजते हैं। अगर बाइबिल की किताब दबाकर न चलते हों, तो चेयरमैन माओ की लाल किताब को दबाकर चलते हैं। फर्क क्या पड़ेगा? महावीर हों कि माओ, और मोहम्मद हों कि मार्क्स, क्या फर्क पड़ता है?

नास्तिक भी जिनको तुम कहते हो, वे भी आस्था ही रखते हैं, झूठी। वे भी आस्तिक ही हैं। विपरीत खड़े होंगे, पीठ किए होंगे, लेकिन उनकी भी श्रद्धा कहीं है। पर वह श्रद्धा भी बस थोथी है। अनुभव के अतिरिक्त आधार कहीं और है नहीं। तो बुद्ध ने कहा, अनुभव पर रखो आधार। तत्व-चर्चा मत छेड़ो। जब कि तत्व को जानने का उपाय है तो व्यर्थ की बकवास क्यों? जब हम जान सकते हैं, आख हमारे पास है, आख खुलते ही सूरज के दर्शन हो जाएंगे, तो आख बंद किए सूरज के संबंध में चर्चा क्यों? और आख बंद रहे तो सूरज के संबंध में लाख चर्चा चले, सदा लगता ही रहेगा-

झूठी खबर किसी की उड़ायी हुई सी है

आंख खुले तो सूरज सत्य है।

फिर सारी दुनिया भी कहती हो कि सूरज नहीं है,

तो भी अंतर नहीं पड़ता।

सत्य अनुभव में आ जाए तो स्वयंसिद्ध है। फिर सारी दुनिया इनकार कर दे, तो भी कोई अंतर नहीं पड़ता। फिर तुम्हें कोई डगमगा नहीं?सकता। जो अपने भीतर स्वयं थिर हो गया, उसे कभी कोई नहीं डगमगा पाया है। और तुम अपने भीतर थिर नहीं हो। तुम्हारी थिरता झूठी है। सम्हाली हुई है।

बुद्ध ने अनुभव दिया, सिद्धात नहीं। बुद्ध ने सत्य देना चाहा, शास्त्र नहीं। बुद्ध ने निःशब्द प्रतीति दी है, सिद्धातों का जाल नहीं। और उसका एक ही मार्ग है कि तुम्हारे मन को तुम्हारे सामने पूरा का पूरा विश्लिष्ट करके रख दिया जाए। अपने मन को तुम पहचान लो, अपनी बीमारी को जान लो, औषधि है। ठीक निदान हो जाए, ठीक औषधि मिल जाए, तुम वही हो जाते हो जिसकी सदियों से चर्चा करते रहे हो। बुद्ध दार्शनिक नहीं हैं। बुद्ध वैज्ञानिक हैं।

बुद्ध ने अपने संन्यासियों को आहार-विहार, चर्या और आचरण के सूक्ष्म एवं सविस्तार नियम दिए। जैसे चार हाथ तक ही आगे देखना, भिक्षु-भिक्षुणी का आपस में व्यवहार किस ढंग का हो, क्या खाना, क्या पहनना, कहा जाना, कहा न जाना, आदि। आप अपने संन्यासियों के लिए ऐसा कुछ क्यों निश्चित नहीं करते?

बुद्ध ने नियम दिए। नियम देने पड़ते हैं, क्योंकि तुम्हारे पास होश नहीं है। अगर होश हो तो नियम व्यर्थ हो जाते हैं। और बुद्ध ने भी सारे नियमों के पीछेहोश पर ही आग्रह किया।

आनंद पूछता है, कोई स्त्री दिखायी पड़ जाए तो क्या करें? तो बुद्ध ने कहा, नीचे देखना। देखना ही मत। और आनंद पूछता है, और अगर ऐसी स्थिति आ जाए कि देखना ही पड़े, तो क्या करना? तो बुद्ध ने कहा, देखना, मगर छूना मत। और आनंद ने कहा, अगर ऐसी घड़ी आ जाए कि छूना ही पड़े, तो क्या करें? तो बुद्ध ने कहा, होश रखना।

तो आखिर में तो होश ही है। देखना मत, छूना मत, ऊपर-ऊपर हैं। अंतिम घड़ी में तो होश ही है। आनंद ने ठीक किया कि वह पूछता ही गया। बुद्ध का असली अनुशासन क्या है फिर? ‘देखना नहीं ! तब तो अंधे देखते नहीं, अंधे परमज्ञान को उपलब्ध हो जाएंगे? छूना मत! हाथ कटवा डालो। तो क्या लूले-लंगड़े परमज्ञान को उपलब्ध हो जाएंगे?

नहीं, अंतिम सूत्र तो बुद्ध ने होश का ही दिया। और अगर होश न हो और तुम आख भी झुका लो तो क्या फर्क पड़ेगा? आख बंद में भी तो स्त्री दिखायी पड़ती चली जाती है। रात सपने में दिखायी पड़ती है, तब क्या करोगे? आख तो बंद ही है। अब सपने में तो कुछ उपाय नहीं और आख बंद करने का। आख के भीतर ही चल रही है। फिर क्या करोगे? आनंद की जगह अगर मैं होता तो मैं पूछता, सपने की फिर? सपने में स्त्री दिख जाए, फिर क्या करना? और ऐसे यह भी बड़ा सपना है। बुद्ध समझते हैं। सपने में स्त्री दिख जाए, फिर क्या करना? फिर कैसे आख झुकाओगे? आख झुकी ही हुई है। आख तो बंद ही है, अब और तो कोई बंद करने का उपाय नहीं।

लेकिन बुद्ध की बात साफ है। बुद्ध ने जो बात कही, उससे सब कोटियों के लिए कह दी। जो अत्यंत जड़बुद्धि हैं, उनसे कहा, आख झुका लेना। यह जड़बुद्धियों के लिए हुआ। जो इतने जड़बुद्धि नहीं हैं, उनसे कहा, देख भी लेना, तो छूना मत। तो है ये भी जड़बुद्धि। अंतिम सूत्र असली सूत्र है। क्योंकि उसके पार फिर कुछ नहीं। वह आखिरी अनुशासन है : स्मरण रखना, होश रखना।

मैंने दो सूत्र छोड़ दिए। क्योंकि दो हजार, ढाई हजार साल का अनुभव कहता हुं, उनसे कुछ फल न हुआ। मैं बुद्ध से ढाई हजार साल बाद हूं तो ढाई हजार साल का कुछ अनुभव भी साथ है। ढाई हजार साल में जो घटा वह साफ है। क्या हुआ? जो ऊपर के नियम थे, वे तो टूट गए। और जो ऊपर के नियमों में उलझे, वे व्यर्थ ही परेशान हुए

और नष्ट हो गए। जिन्होंने आखिरी सूत्र पकड़ा, वही बचे।

अब मैं तुम्हें उदाहरण दूं कि कैसे घटना घटती है।

एक गांव में बुद्ध ठहरे। एक भिक्षु भिक्षा का पात्र लेकर लौट रहा था वापस। एक चील के मुंह से मास का टुकड़ा छूट गया। वह भिक्षापात्र में गिर गया टुकड़ा मास का। अब बड़ी कठिनाई खड़ी हो गयी। क्योंकि बुद्ध कहते हैं कि मास खाना नहीं। और बुद्ध ने यह भी कहा है कि भिक्षापात्र में जो भी डाल दिया जाए, उसे अस्वीकार नहीं करना। अब क्या करना ‘ बड़ी दुविधा खड़ी हो गयी।

भिक्षु आया। उसने बुद्ध से पूछा, अब क्या करें? दो नियमों में विरोध हो गया। आप कहते हैं, जो भी भिक्षापात्र में कोई डाल दे उसे इनकार नहीं करना।

यह इसलिए कहना पड़ा कि भिक्षु बड़े कुशल हो जाते हैं। जैन मुनियों को देखो, वे इशारा कर देते हैं कि क्या डालो। इशारा कर दिया कि यह मत डालो। मुंह से न बोलेंगे, हाथ से इशारा कर देंगे। क्योंकि बोलने के लिए महावीर ने मना किया है, मांगना मत! तो वे इशारा कर देते हैं कि यह डाल दो, थोड़ा और ज्यादा डाल दो। मगर मुंह से नहीं बोलते। आखिर बेईमान आदमी के लिए नियम क्या करेंगे? कितने कानून हैं दुनिया में। लेकिन चोर हमेशा कानून में से रास्ता निकाल लेता है 1 आखिर वकील किसलिए हैं ‘ वे रास्ता निकालने के लिए हैं। वह चोर को बताने के लिए कि बनाने दो नियम उनको। हम बैठे हैं। तुम घबड़ाते क्यों हो? आदमी के मन में तर्क है, वह वकील है। वह रास्ता खोज लेता है।

वह भिक्षु आया। उसने कहा कि यह क्या मामला, अब क्या करना? आपने कहा भिक्षापात्र में जो भी डाल दिया जाए.।

यह बुद्ध ने इसलिए कहा कि नहीं तो लोग मांगते हैं। और बुद्ध का भिक्षु भिखारी हो जाए भद्दा है। भिक्षु भिखारी नहीं है। वह कोई माग नहीं रहा है। दे दो तो भला, न दो तो भला। वह आशीर्वाद ही देगा। और अगर वह मांगने लगे, तो फिर बोझ हो जाता है। किसी गरीब के घर के सामने खड़ा हो जाए और खीर मांगने लगे, और गरीब न दे सके तो पीड़ा होती है। और दे तो कठिनाई हो जाती है। रूखा-सूखा जो गरीब दे-दे, वही ले लेना। न दे, तो मन में कुछ बुराई मत लाना, विरोध मत लाना। इसलिए कहा था। बुद्ध को पता भी न था कि जिंदगी ऐसी है कि अब चील कहीं मास का टुकड़ा गिरा दे। अपवाद है। कोई रोज चील मांस का टुकड़ा गिराएगी भी नहीं।

लेकिन अब उस बौद्ध भिक्षु ने पूछा, अब क्या करें? और आप कहते हैं, मास खाना नहीं। अब इन दोनों में विरोध हो गया।

नियमों में हमेशा विरोध हो जाएगा। क्योंकि जिंदगी जटिल है। जिंदगी तुम्हारे नियम मानकर थोड़े ही चलती है। भिक्षु मानता होगा नियम, चील थोड़े ही मानती है। चील थोड़े ही कोई बौद्ध भिक्षु है कि बुद्ध के वचन सुनती है! चील अपनी मौज में होगी, छोड़ गयी। और चील को कोई पता भी नहीं है कि भिक्षु के पात्र में गिर जाएगा। भिक्षु के पात्र में गिराया भी नहीं है।

जीवन में संयोग होते हैं। सिद्धात नहीं चलते, टूट जाते हैं। संयोग रोज बदल जाते हैं। सिद्धात अधूरे पड़ जाते हैं। सिद्धात तो ऐसे ही हैं जैसे छोटे बच्चे के लिए पैंट-कमीज बनाया। वह बच्चा बड़ा हो गया, अब वह पैंट–कमीज छोटा पड़ गया। अब दो ही उपाय हैं। या तो पैंट-कमीज बड़ा करो, और या फिर बच्चे को दबा-दबा कर छोटा रखो। तो पैंट-कमीज बड़ा करने में कठिनाई मालूम होती है। कौन करे बड़ा ‘ बुद्ध तो जा चुके। तो जो वह नियम दे गए हैं उसको रहने दो, चाहे आदमी को ही छोटा रहना पड़े तो हर्जा नहीं। लेकिन नियम तो नहीं बदला जा सकता। कौन बदलेगा नियम? और एक बार बदलने की सुविधा दो तो फिर कहा रोकोगे?

बुद्ध ने सोचा। बुद्ध अक्सर सोचते नहीं। ऐसा उन्होंने आख बंद कर ली। उन्‍होंने बहुत सोचा कि यह मामला तो जटिल है। फिर उन्होंने सोचा, अगर मैं कहूं तूम चुनाव कर सकते हो पात्र में से, जो योग्य न हो वह छोड़ दिए, तो वह जानते मै’ कि यह तो खतरा हो जाएगा। तो लोग जो नहीं खाना-पीना है वह फेंक देंगे और जो खाना-पीना है वह खा-पी लेंगे। और चुनाव भिक्षु को नहीं करना चाहिए। जो आ  गया भाग्य में, वही ठीक है। फिर अगर यह कहूं कि जो मिल जाए वह खा लेना, तो अब इस मास के टुकड़े का क्या करना? फिर बुद्ध को खयाल आया कि चीले कोई रोज तो गिराएंगी नहीं। अब शायद कभी भी न गिरे। हो गया एक दफे, यह संयोग था। इस एक संयोग के लिए नियम बनाना ठीक नहीं। तो बुद्ध ने कहा। क कोई फिकर न करो, जो पात्र में गिर जाए वह खा लेना। अगर मांस गिर गया तो वह तुम्हारे भाग्य का हिस्सा है।

बुद्ध ने सोचा था, चीले रोज मास न गिराएंगी। लेकिन अब बौद्ध भिक्षुओं के पात्र में रोज मास गिरता है। जापान, चीन, बर्मा-रोज। अब श्रावक गिराते हैं। और मू?ाrक एक दफा बुद्ध ने आज्ञा दे दी थी कि जो पात्र में गिर जाए वह खा लेना, अब आवक मास डालते है, मछली डालते हैं, और भिक्षु खाता है। क्योंकि नियम है। इसलिए दुनिया के बड़े से बड़े अहिंसक विचारक बुद्ध की परंपरा में मांसाहार प्रचलित हो गया। चील ने शुरू करवा दिया।

अंततः तो होश ही काम आएगा। बाकी कोई नियम काम न आएंगे। इसलिए मैंने सारी विस्तार की बातें छोड़ दी हैं। क्योंकि मैं जानता हूं अगर तुम्हें तोड़ना ही नं तो तुम तरकीब निकाल लोगे। तो तोड़ने का भी तुमको कष्ट क्यों देना। और तोड़ने से जो अपराध का भाव पैदा होता है, वह क्यों पैदा करना।

मैं तुम्हें कोई नियम ही नहीं देता। ताकि तुम तोड़ ही न सको। मैं तुम्हें सिर्फ होश देता हूं। सम्हाल सको तो ठीक, न सम्हाल सको तो भी ठीक है। लेकिन बेईमानी पैदा न होगी, पाखंड पैदा न होगा।

सारे धर्म सफीनों में डूब गए। नाव में डूबे। नियम बनाया, उसी में डूबे। अब यह बहुत हो चुका। मैं तुम्हें नाव ही नहीं देता। अगर डूबना ही हो तो नदी में ही डूबना। नाव में क्या डूबना! कहने को तो रहेगा कि नदी में डूबे। यह भी क्या बात हुई कि नाव में डूब। नाव तो बचाने को होती है। जो नाव में डूबते हैं, उन्हीं को हम पाखंडी कहते हैं।

तो मैं तुमसे कहता हूं कम से कम एक बात साफ रखना। या तो होश सम्हालना, तो तुम धार्मिक। होश न सम्हाल सको, तो तुम अधार्मिक। मैं दोनों के बीच में कोई जगह नहीं छोड़ रहा हूं। पाखंडी के लिए जगह नहीं छोड़ रहा हूं

पाखंडी कौन है? वह आदमी पाखंडी है, जो है तो अधार्मिक, लेकिन धार्मिक नियमों को पालकर चलता है। रोज मंदिर जाता है। अधार्मिक कैसे कहोगे? यद्यपि मंदिर में कभी उसने प्रार्थना नहीं की। क्योंकि जिसे प्रार्थना करनी आती हो वह घर ही मंदिर हो जाता है उसका। उसे मंदिर जाने की कोई जरूरत नहीं रह जाती। वह नियम से भोजन करता है। रात भोजन नहीं करता, दिन भोजन करता है। लेकिन इससे उसकी हिंसा नहीं जाती। शायद हिंसा और बढ़ जाती है।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि मांसाहारी व्यक्ति कम क्रोधी होते हैं। शिकारी को तुम अक्सर कम क्रोधी पाओगे। क्योंकि उसकी हिंसा निकल जाती है। मार लेता है जाकर जंगल में सिंह को। अब जिसने सिंह को मार लिया, वह तुम्हें मारने को उत्सुक भी नहीं होता। तुम्हें मारना भी क्या! अब कोई बैठे हैं दुकान पर ही माला जप रहे हैं, वह कभी कहीं गए नहीं, किसी को मारा नहीं, कोई झगड़ा-झांसा लिया नहीं, वह तैयार बैठे हैं। वह चींटी पर भी टूट पड़े, सिंह की तो बात दूर! बहाना भर चाहिए उनको। उनकी हिंसा का निकास नहीं हो पाया।

नियम देने का एक ही परिणाम हुआ है संसार में, और वह यह है कि लोग नियम को पूरा कर लेते हैं और होश को गंवा देते हैं।

जीसस के जीवन में उल्लेख है, एक आदमी आया-निकोडेमस। वह बहुत धनी आदमी था। उसने जीसस से कहा कि मुझे भी बताएं कि मेरे जीवन में क्रांति कैसे हो और मैं परमात्मा को कैसे पाऊं। तो जीसस ने कहा कि जो नियम मूसा ने दिए हैं-दस नियम, दस आज्ञाएं-उनका पालन करो। तुम पढ़े-लिखे हो, तुम्हें पता है। उसने कहा कि मैं उनका अक्षरश: पालन करता हूं फिर भी जीवन में कोई क्रांति नहीं हुई। न मैं चोरी करता। न मैं किसी स्त्री की तरफ बुरे भाव से देखता। दान देता हूं प्रार्थना करता हूं पूजा करता हूं। जैसा धार्मिक जीवन होना चाहिए, निभाता हूं। लेकिन कोई क्रांति नहीं होती।

तो जीसस ने कहा, ठीक है। तब तुम एक काम करो। तुम्हारे पास जो भी है, तुम जाओ घर, उसे बाट आओ और मेरे पीछे चलो।

उस आदमी ने कहा, यह जरा मुश्किल है। तुम्हारे पीछे चलना, और सब बाट कर ‘वह आदमी उदास हो गया। वह बड़ा धनी था। उसने कहा कि नहीं; कोई ऐसी आत बताओ जो मैं कर सकूं।

जीसस ने कहा, जो तुम कर सकते हो उससे तुम बदलोगे न। क्योंकि वह तो तुम कर ही रहे हो। अब मैं तुमसे वह कहता हूं जो तुम कर नहीं सकते। अगर किया, तो बदल जाओगे। अगर नहीं किया, तो तुम जैसे हो वैसे हो। जाओ सब बाट दो। उसने कहा, मेरे पास बहुत धन है। इतने कठोर मत हों। और अभी बहुत काम उलझे है, मैं एकदम आपके पीछे आ नहीं सकता। जीसस ने अपने शिष्यों की तरफ देखा और वह प्रसिद्ध वचन कहा, जो तुमने बहुत बार सुना होगा, कि सुई के छेद से ऊंट जाए लेकिन धनी आदमी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न कर सकेगा।

धनी नियम तो पाल लेता है, लेकिन धार्मिक नहीं हो पाता। धनी को सुविधा है नियम पालने की। वह रोज दिन में तीन दफे मंदिर जा सकता है, या पाच दफे नमाज पढ़ सकता है। गरीब तो पाच दफे नमाज भी नहीं पढ़ सकता। फुर्सत कहा है? समय कहा ‘ मंदिर कैसे जाए? दफ्तर जाए, फैक्ट्री जाए, खेत पर जाए कि मंदिर जाए। रोज गीता नहीं पढ़ सकता। समय कहा? भजन नहीं कर सकता, क्योंकि पेट में भूख ?ऐ। धनी तो भजन कर सकता है, पूजा कर सकता है। खुद न भी करने की इच्छा हो तो नौकर रख सकता है। मजदूर रख सकता है पूजा करने को। नौकर-चाकर रखे हैं लोगों ने, उनको पुजारी कहते हैं। उनसे कहते हैं, तुम पूजा कर दो। उनको तनख्वाह। मिलती। है। पूजा का फल मालिक को मिलता है। नौकर रख ले सकते हो।

कितनी बेहूदगी की बात है। प्रेम और पूजा के लिए भी नौकर! उसे भी तुम दूसरे से करवा लेते हो पैसे के बल पर। तो अगर तुमने एक पुजारी को सौ रुपया महीना। दया, और उसने रोज आकर तीन दफा भगवान की पूजा की, तो अगर ठीक से समझो तो हिसाब ऐसा है कि तुमने भगवान को सौ रुपए दिए। और क्या दिया? तुम्‍हारे पास थे, तुम दे सकते थे। और शायद यह सौ रुपए देकर तुम करोडों पाने की आकांक्षा कर रहे हो। यह भी शायद रिश्वत है।

नियम तो पूरे किए जा सकते हैं। नियम के पूरे करने से कोई धार्मिक नहीं होता। पाखंडी हो जाता है, हिपोक्रेट हो जाता है।

इसलिए मैंने कोई नियम तुम्हें नहीं दिए। या तो तुम धार्मिक होओ, या अधार्मिक। बीच की मैंने तुम्हें सुविधा नहीं दी है। इसलिए मैं तुम्हें वही आखिरी बात कहता हूं जो बुद्ध ने आनंद को कही, होश साधना। आख बंद करना, न करना; क्या ‘फर्क पड़ता है। मेरी दृष्टि में ऐसा है कि अगर तुमने होश साधा-आख खुली रखो, स्त्री को छुओ, धन कमाओ, मकान में रहो, बाजार में बैठो, कोई अंतर नहीं पड़ता। होश न सधा-आख बंद रखी, जंगल में भाग गए, धन न छुआ, नंगे खड़े हो गए, सब त्याग दिया, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। होश से ही क्रांति होती है।

इसलिए होश अकेला नियम है, एकमात्र नियम। एस धम्मो सनंतनो। यही एकमात्र सनातन नियम है। यही एकमात्र सनातन धर्म है कि तुम जागकर जीना, और मैं तुमसे कुछ भी नहीं मांगता। विस्तार की बातों में तो तुम बहुत बार धोखा दे गए हो। मैं तुम्हें विस्तार का मौका ही नहीं देता। बस एक छोटा सा शब्द देता हूं : अवेयरनेस, होश। ताकि तुम साफ रहो। सधे तो साफ रहो, न सधे तो साफ रहो। दोनों के बीच में धोखा देने की सुविधा नहीं देता।

इसलिए मैंने कोई नियम नहीं दिए। तुम यह मत समझना कि मैंने नियम नहीं दिए। नियम दिया है। नियम नहीं दिए हैं। और नियम काफी है। कहावत है, सौ सुनार की एक लुहार की। मेरा नियम लुहार वाला है। डिटेल्स और विस्तार की बातों में मैं नहीं पड़ा हूं। क्योंकि तुम उनमें काफी कुशल हो गए ही।

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, ध्यान तो ठीक, लेकिन कुछ और बताएं कि हम क्या करें, क्या खाएं, क्या पीए, क्या पहनें, कब सोए, कब जागे? ये व्यर्थ की बातें तुम्हीं सोच लेना। तुम सिर्फ ध्यान करो। अगर तुम्हारा मन शात और जागरूक होता जाए तो तुम खुद ही पाओगे कि और नियम अपने आप उसके पीछे आने लगे।

होशपूर्ण व्यक्ति अपने आप शराब न पीएगा। क्योंकि शराब तो होश के विपरीत है। वह तो होश को नष्ट कर देगी। उसे नियम देने की जरूरत नहीं कि शराब मत पीयो। होशपूर्ण व्यक्ति अपने-आप मांसाहार छोड़ देगा। क्योंकि जिसको जरा सा भी होश आया उसे इतना न दिखायी पड़ेगा कि दूसरे का जीवन लेना सिर्फ पेट भरने के लिए! अगर इतना भी न दिखायी पड़े होश में तो वह होश दो कौड़ी का है। उसका क्या मूल्य है? होशपूर्ण व्यक्ति क्या चोरी करेगा? किसी की जेब काटेगा? होशपूर्ण व्यक्ति को अणुव्रत देने की जरूरत नहीं है कि चोरी मत करो, हिंसा मत करो, बेईमानी मत करो। ये विस्तार की बातें तो इसीलिए देनी पड़ती हैं कि होश नहीं है, होश खो गया है। और ये सब तुम पूरी कर सकते हो। इनमें कुछ अड़चन नहीं है। तुम दान कर सकते हो, ईमानदारी कर सकते हो, सेवा कर सकते हो, बस एक चीज में अड़चन आती है-तुम होश नहीं साध सकते।

और अगर मैं तुम्हें एक हजार एक विस्तार की बातें दे दूं तो तुम कहोगे, एक हजार एक में से एक हजार का तो हम पालन कर रहे हैं, अगर एक ध्यान का नहीं भी कर रहे, तो क्या हर्जा है?

मैं तुम्हें एक ही देता हूं ताकि जीवन-स्थिति साफ रहे। पाखंड के पैदा होने का उपाय न हो। मैं तुम्हें नियम नहीं देता, ताकि तुम नियम तोड़ न सको। मैं तुम्हें नियम नहीं देता, ताकि तुम नियम पालकर धोखा न दे सको। मैं तुम्हें नियम नहीं देता, सिर्फ एक सूत्र देता हूं। शास्त्र नहीं देता, सिर्फ सूत्र देता हूं-होश।

महावीर से किसी ने पूछा है, साधु कौन, असाधु कौन? तो महावीर ने वह नहीं कहा जो जैन-मुनि कह रहे है-कि जो दिन को भोजन करे वह साधु, जो रात को भोजन करे वह असाधु; जो पानी छानकर पीए वह साधु, जो पानी छानकर न पीए वह असाधु। नहीं, महावीर ने विस्तार की बातें न कही। महावीर ने एक लुहार की बात कही। महावीर ने कहा, असुता मुनि: सुत्ता अमुनि। जो सोया-सोया जी रहा है, वह असाधु; जो जागा-जागा जी रहा है-असुत्ता-वह साधु, वह मुनि।

यही मैं तुमसे कहता हूं। यही बुद्ध ने भी कहा है। लेकिन पच्चीस सौ वर्ष का अनुभव मेरे पास है जो उनके पास नहीं था। अगर आज बुद्ध हों तो वे यह नहीं कहेंगे कि पहले देखना मत, छूना मत। आज वे पहले ही कह देंगे आनंद, अब व्यर्थ की बकवास में न जा-तू इतने प्रश्न पूछे, फिर मैं असली बात कहूं-पहले ही कहे देता हूं होश रखना।

बुद्ध कहते है, अल्‍पतम पर, अत्यंत जरूरी पर ही जीयो। आप कहते हैं, कंजूसी से, कुनकुने मत जीयो, अतिरेक में जीयो। हम दोनों के बीच कैसा तालमेल बिठाएं?

तालमेल बिठाने को कहा किसने है। बुद्ध ठीक लगें, बुद्ध की बात मान लो। मैं ठीक लगूं मेरी बात मान लो। तालमेल बिठाने को कहा किसने है। एलोपैथी, होमियोपैथी में तालमेल बिठालना भी मत। तालमेल की चिंता बड़ी गहरी है तुम्हारे मन में, कि किसी तरह तालमेल बिठा लें। तुम्हें लेना-देना क्या ? तालमेल से? जो दवा तुम्हारे काम पड़ जाए, उसे स्वीकार कर लेना। तुम्हें कोई सारी दुनिया की पैथीज में तालमेल थोड़े ही बिठालना है।

बुद्ध ने कहा है, जीयो न्यूनतम पर, यह एक छोर। क्योंकि छोर से ही छलांग लगती है। किसी चीज के मध्य से न कूद सकोगे, छोर पर आना पड़ेगा। अगर इस छत से कूदना है, तो कहीं भी छोर पर आना पड़ेगा, वहां से छलांग लगेगी। हर चीज के दो छोर है।

बुद्ध ने कहा, अल्पतम, न्यूनतम, कम से कम पर आ जाओ, वहा से छलांग लग जाएगी। मैं कहता हूं अतिरेक। अंतिम पर आ जाओ, वहा से छलांग लग जाएगी। बुद्ध कहते हैं, दीन, दरिद्र, भिक्षु हो जाओ। मैं कहता हूं? सम्राट बन जाओ।

मगर दोनों छोर हैं। बुद्ध कहते हैं, इधर हट आओ। मैं कहता हूं? उधर बढ़ जाओ।

तालमेल मत बिठालना। नहीं तो तुम बीच में खड़े हो जाओगे। तुम कहोगे, अब यह भी कहते हैं कि बिलकुल छोड़ दो। मैं कहता हूं, कुछ छोड़ने की जरूरत नहीं। तुम कहोगे, आधा पकड़ो, आधा छोड़ो। इधर बीच में खड़े हो जाओ। यह समन्वय, यह तालमेल तुम्हें मार डालेगा। कोई जरूरत नहीं है तालमेल बिठालने की। बुद्ध परिपूर्ण हैं। मेरी बात जोड़ने से कुछ फायदा न होगा, नुकसान होगा।

प्रत्येक व्यवस्था पूरी है। बुद्ध ने जो दिया है, वह पूरी व्यवस्था है। उसमें रत्तीभर कमी नहीं है। वह यंत्र अपने आप में परिपूर्ण है। मेरी बातों को उसमें मत जोड़ देना। मैं तुम्हें जो दे रहा हूं? वह परिपूर्ण है। उसमें बुद्ध को कुछ जोड़ने की जरूरत नहीं है। दुनिया के सारे धर्म अपने आप में पूरी इकाई हैं। और झंझट तब खड़ी होती है, जब तुम्हें कोई समझाने वाला मिल जाता है और कहने लगता है, अल्लाह ईश्वर तेरे नाम, सबको सनमति दे भगवान। तब तालमेल शुरू हुआ। उपद्रव शुरू हुआ। अल्लाह पर्याप्त है। उसमें राम को जोड़ने की कोई भी जरूरत नहीं। राम पर्याप्त हैं। उसमें अल्लाह को जोड़ने की कोई जरूरत नहीं।

और महात्मा गांधी भी जोड़ न पाए, कहते रहे। जुड़ सकता नहीं। मरते वक्त जब गोली लगी, तो अल्लाह न निकला, राम निकला। उस वक्त दोनों निकल जाते, अल्लाहराम! वह नहीं हुआ। वे जुड़ते नहीं। वे इकाइयां अलग-अलग हैं। मरते वक्त जब गोली लगी, तब वह भूल गए, अल्लाह ईश्वर तेरे नाम। तब राम ही निकला। वही निकट था। अल्लाह तो राजनीति थी। राम हृदय था। अल्लाह तो जिन्ना को समझाने को कहे जाते थे। भीतर तो राम की ही गंज थी। और जिन्ना को यह चालबाजी दिखायी पड़ती थी, इसलिए उसको कुछ असर न पड़ा।

मेरे पास तुम तालमेल बिठालने की बात ही छोड़ दो। मैं कोई समन्वयवादी नहीं हूं। मैं कोई सारे धर्मों की खिचड़ी नहीं बनाना चाहता हूं। प्रत्येक धर्म का भोजन अपने आप में परिपूर्ण है। वह तुम्हें पूरी तृप्ति देगा। जब मैं बुद्ध पर बोल रहा हूं या जब मैं ईसा पर बोलता हूं या महावीर पर बोलता हूं तो मेरा प्रयोजन यह नहीं कि तुम इन सबको जोड लो। इन पर मैं अलग-अलग बोल रहा हूं इसीलिए, ताकि हो सकता है किसी को बुद्ध की बात ठीक पड़ जाए, किसी को महावीर की ठीक पड़ जाए, किसी को कृष्‍ण की ठीक पड़ जाए। जिसको जहां से ठीक पड़ जाए। रास्ते थोड़े ही गिनने हैं। गुठलियों का थोड़े ही हिसाब रखना है। आम खाने हैं। तो तुम तालमेल बिठाओगे किसलिए?

तुम्हें बुद्ध की बात जमती है, फिक्र छोड़ो मेरी। कुछ लेना-देना नहीं मुझसे फिर। फिर

तुम उसी मार्ग पर चले जाओ। वहीं से तुम्हें परमात्मा मिल जाएगा। वह रास्ता परिपूर्ण है। उसमें रत्तीभर जोड़ना नहीं है।

अगर तुम्हें बुद्ध की बात नहीं जमती, मेरी बात जमती है, तो भूल जाओ सब

बुद्धों को। क्योंकि उनकी याददाश्त भी बाधा बनेगी।

और मन का एक बड़े से बड़ा उपद्रव यही है कि वह कभी किसी एक दिशा के प्रति पूरा समर्पित नहीं होता। एक कदम बाएं जाते हो, एक कदम दाएं जाते हो, कभी आगे जाते, कभी पीछे जाते। जिंदगी के आखिर में पाओगे, वहीं खड़े-खड़े घिसटते रहे हो जहां पैदा हुए थे।

गति ऐसे नहीं होती। गति तो एक दिशा में होती है। चुन लिया पश्चिम, तो पश्चिम सही। फिर भूल जाओ बाकी तीन दिशाएं हैं भी। माना कि हैं। और कुछ लोग उन दिशाओं में भी चल रहे हैं, वह भी माना 1 लेकिन वे दिशाएं तुमने छोड़ दीं। पूग अब पश्चिम जा रहे हो, तो तुम पश्चिम ही जाओ। ऐसा न हो कि एक हाथ पूरब जा रहा है, एक पश्चिम जा रहा है। एक टांग दक्षिण जा रही है।

तालमेल तो न बैठेगा, उस तालमेल की चेष्टा में तुम बुरी तरह खंडित हो जाओगे। और यही गति मनुष्य की हो गयी है। आज से पहले, जब दुनिया इतनी एक-दूसरे के करीब न थी, और जमीन एक छोटा सा गाव नहीं हो गयी थी, और जब एक धर्म से दूसरा धर्म परिचित नहीं था, तब बहुत लोगों ने परमज्ञान को पाया। जैसे -जैसे जमीन सिकुड़ी और छोटी हुई, और एक-दूसरे के धर्म से लोग परिचित ,वैसे ही धार्मिकता कम हो गयी। उसका कारण यह है कि सभी के मन में सभी दिशाएं समा गयीं। कुरान भी पढ़ते हो तुम, गीता भी पढ़ते हो। न तो गीता में डूब पाते, न कुरान में डूब पाते। जब कुरान पढ़ते हो तब गीता की याद आती है, जब गीता पढ़ते हो तब कुरान की याद आती है। और तालमेल बिठालने में लगे रहते हो।

नहीं, दुनिया का प्रत्येक धर्म अपने आप में समग्र है। न उसमें कुछ घटाना है, न उसमें कुछ जोड़ना है। वह पूरी व्यवस्था है 1 तुम्हें जंच जाए, उसमें उतर जाना है। और बाकी सबको भूल जाना है। यही तो अर्थ है गुरु चुनने का कि तुमने देख लिया, लिया; खोजा, सोचा, चिंतन किया, मनन किया, पाया कि किसी से मेरा तालमेल बैठता है।

दो व्यवस्थाओं में तालमेल नहीं बिठालना है। तुममें और किसी व्यवस्था में तालमेल बैठ जाए इसकी समझ पैदा करनी है कि हा, इस आदमी से मन भाता है, रस लगता है। और हर आदमी को अलग-अलग रस लगेगा।

अब मीरा को तुम बुद्ध में लगाना चाहो तो न लगा सकोगे। और अगर तुम सफल हो जाओ, तो मीरा का दुर्भाग्य होगा; वह भटक जाएगी। उसे तो गा से ही लग सकता था। नाच उसके रोएं-रोएं में समाया था। बुद्ध उस नाच को मुक्त नहीं कर सकते थे। बुद्ध की व्यवस्था में नाच की सुविधा नहीं है। वह उनके लिए है, जो नाच छोड़ने में रस रखते हैं। वह उनके लिए है, जो गति छोड़ने में रस रखते हैं। मीरा को न जमती बात। बुद्ध की कोई बांसुरी ही नहीं है। बुद्ध के पास नाचने में बात बे-मौजूं होती।

बुद्ध की मूर्ति के पास नाचोगे तो तुम्हें भी अजीब सा लगेगा, असंगत लगेगा। यह मूर्ति नाचने के लिए नहीं है। इस मूर्ति के पास तो चुप होकर बैठ जाना है। इसके पास तो पत्थर हो जाना है। इसके पास तो ऐसे अकंप हो जाना है कि पता ही न चले कि तुम आदमी हो कि संगमरमर हो। तो ही तुम बुद्ध के रास्ते पर जा सकोगे।

अगर नाचने की थोड़ी भी भावदशा हो तो कृष्ण को देखना। फिर वहाँ मोर-मुकुट वाले कृष्‍ण से कुछ बात बन सकती है। वह आदमी इसीलिए है। उनकी बांसुरी फिर तुम्हारे भीतर छिपे नाच को मुक्त कर देगी। और मुक्ति का कोई अर्थ नहीं होता। मुक्ति का यही अर्थ होता है, तुम्हारे भीतर जो छिपा है वह प्रकट हो जाए, खिल जाए। अगर तुम एक कमल अपने भीतर छिपाए हो, तो वह खिल जाए हजार-हजार पंखुडियों में, उसकी सुगंध लुट जाए हवाओं में। अगर तुम नाच छिपाए हो तो नाच प्रकट हो जाए। अगर कोई गीत अनगाया पड़ा है तो गा दिया जाए। अगर कोई मौन सधने को बैठा है, तो सध जाए। तुम्हारी जो नियति है वह पूरी-पूरी उपलब्ध हो जाए।

हर आदमी की अलग-अलग नियति है। हर आदमी का अलग-अलग ढंग है। हर आदमी अनूठा है, बेजोड़ है। इसलिए तुम्हें अपना तालमेल किससे बैठ सकता है-किस गुरु से, किस शास्ता से, किसका अनुशासन तुम्हें मौजूं आता है। और अगर तुम इसमें जरा भी भूल-चूक किए तो बड़ी उलझन में पड़ जाओगे। तुम एक खिचड़ी बन जाओगे। तुम्हारे भीतर बहुत सी चीजें होंगी, लेकिन सब खंड-खंड होंगी। और तुम्हारे भीतर एक प्रतिमा निर्मित न हो पाएगी।

तुम थोड़ा सोचो, बुद्ध की गर्दन हो, कृष्‍ण के पैर हों, महावीर का हृदय हो, जीसस के हाथ हों, मोहम्मद की वाणी हो, सब गड़बड़ हो जाएगा, तुम पागल हो जाओगे। एकदम पागल हो जाओगे। तुम मुका तो न हो पाओगे, विक्षिप्त हो जाओगे।

इसलिए दुनिया के सारे धर्मों ने एक बात पर जोर दिया है कि अगर यह बात ठीक लगती है, तो बस पूरा समर्पण चाहिए। ठीक नहीं लगती है, कहीं और खोज लो। असली सवाल पूरा समर्पण है। जहां भी जाओ, पूरा समर्पण कर दो।

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, हम तो सभी गुरुओं के पास जाते हैं। सभी गुरु समान हैं। बड़ी ज्ञान की बातें कर रहे हैं वे, कि जो आप कहते हैं वही तो वे भी कहते हैं। न वे मुझे समझते हैं, न वे किसी और को समझते हैं कुछ। उन्होंने अभी समझा ही नहीं। यह तो अंतिम बात है।

मंजिल पर सभी गुरु एक हैं, मार्गों पर एक नहीं हैं। और जिसको चलना है, उसको मंजिल का सवाल नहीं है, मार्ग का सवाल है। अंत में पहुंचकर एक हैं। कृष्‍ण की बांसुरी का गीत भी वहीं पहुंचा देगा, जहां बुद्ध का मौन पहुंचाता है। लेकिन यह मंजिल की बात है। तुम वहा नहीं हो। भूलकर वहा अपने को समझ मत लेना। जहां नहीं हो, वहा समझने से कुछ लाभ नहीं। जहां हो, तुम जहां खड़े हो, वहा से रास्ता चाहिए, मंजिल नहीं। वहा तो अल्लाह अलग है, राम अलग है।

हां, मंजिल पर जो पहुंच गए हैं वहा सब एक है। लेकिन वहा कोई भजन थोड़े ही कर रहा है, अल्लाह ईश्वर तेरे नाम। मंजिल पर तो सब खो गया। वहा अल्लाह भी खो गए हैं, राम भी खो गए। जब अल्लाह ही मिल गया, राम ही मिल गया, तो फिर न राम बचे न अल्लाह बचे। वहा तो सब शास्त्र खो जाते हैं। लेकिन वह उपलब्धि की बात है।

तालमेल तुम बिठालना मत। मेरी तो दृष्टि यही है कि तुम भरपूर जीओ। तुम ऐसे जीओ जैसे बाढ़ आयी नदी होती है। तुम जीवन को उसकी त्वरा में जीओ। तुम ऐसे जीओ जैसे किसी ने मशाल को दोनों तरफ से जलाया हो। तुम जीने में कंजूसी मत करो।

मैं तुमसे त्याग को नहीं कहता। मैं तुमसे कहता हूं तुम भोग में इतने गहरे उतरो कि भोग का अनुभव ही त्याग बन जाए। तेन त्यक्तेन भुजीथा। तुम ऐसा भोगो कि तूम जान लो कि भोग व्यर्थ है। और भोग छोडना न पड़े। तुम्हारा जान ही भोग का छूटना हो जाए। तुम जीवन से भागो मत, भगोड़े मत बनो। तुम जीवन में जमकर खड़े हो जाओ, ताकि जीवन से आंखें मिल जाएं और तुम जीवन को पूरी तरह देख इसे लो कि यह सपना है। फिर सपने को छोड़ना थोड़े ही पड़ता है, सपना तो छूट ही गया। जो व्यर्थ है, दिखायी पड़ते ही कि व्यर्थ है, गया। छोड़ने का अगर फिर भी सवाल रहे, तो समझना अभी व्यर्थता दिखायी नहीं पड़ी। अभी थोड़ी सार्थकता दिखायी पड़ती है। इसलिए छोड़ने का सवाल है। सार्थक को छोड़ना पड़ता है। व्यर्थ छूट जाता है।

तो मैं तुमसे कहता हूं? जीवन को उसकी परिपृर्णता में जानो। तुम बहुत बार अनेक लोगों के प्रभाव में आ गए हो, और कच्चे ही जीवन को छोड़कर भाग गए हो। यह कोई पहला मौका नहीं है। क्योंकि जमीन पर तुम नए नहीं हो। बड़े प्राचीन हो। बहुत बार बहुत बुद्धों के प्रभाव में तुम आ गए हो। जो बुद्ध को घटा था वह तो परिपूर्ण जीवन से घटा था। यह थोड़ा समझो।

बुद्ध तो सम्राट थे। सुंदरतम स्त्रियां उनके पास थीं। और अगर उतनी सुंदर स्त्रियों के बीच उन्हें दिखायी पड़ गया कि सौंदर्य सब सपना है, तो कुछ आश्चर्य नहीं। अब एक भिखारी है, जिसने स्त्रियों को ‘केवल दूर से देखा है। जिसे कोई स्त्री उपलब्ध नहीं हुई। या उपलब्ध भी हुई हो तो एक साधारण सी स्त्री उपलब्ध हुई है, जिसमें स्त्री होना नाममात्र को है, जिससे उसके सपने नहीं भरे; न हृदय भरा, न प्राण तृप्त हुए, न भोग गहरा गया। आकांक्षा घूमती रही, भटकती रही सब तरफ। हजार-हजार चेहरे आकांक्षा में उभरते रहे, सपनों में जगते रहे।

अब यह बुद्ध की बातें सुन ले यह आदमी। तो बुद्ध प्रभावी हैं, इसमें कोई शक-शुबहा नहीं है। उस ज्ञान की अवस्था में आदमी में एक जादू हो जाता है। वह जिसकी तरफ देख ले, वही खिंचा चला आता है। वह जिसको छू दे, उसी के भीतर एक नया आयाम खुल जाता है।

तुमने बुद्ध को सुन लिया, और बुद्ध ने कहा कि सब व्यर्थ है। बुद्ध यह जानकर कह रहे हैं, धन उन्होंने जाना है कि व्यर्थ है। तुमने केवल धन की कामना की है, जाना-वाना नहीं कि व्यर्थ है। जानने के लिए तो होना पहले चाहिए। वह है ही नहीं तुम्हारे पास। भिक्षापात्र लिए खड़े हो। सम्राट थे बुद्ध। वे छोड़कर रास्ते पर आ गए। तुम रास्ते पर ही थे, और तुमने बुद्ध की वाणी सुन ली, और तुम प्रभावित हो गए, तुम मुश्किल में पड़ोगे। क्योंकि तुम्हारा त्याग बुद्ध का त्याग नहीं हो सकता। तुम्हारे त्याग में भोग छिपा ही रहेगा। तब क्या होगा? तब यह होगा कि तुम त्याग भी करोगे और सोचोगे, त्याग के बाद स्वर्ग मिलने वाला है। स्वर्ग में भोगेंगे अप्सराएं, महल। तुम्हारे ऋषि-मुनि यही कर रहे हैं। इंद्र अगर उनसे डर जाता है तो अकारण नहीं। क्योंकि वे मुक्त होने की इच्छा नहीं रखे हुए हैं, वे इंद्र के सिंहासन पर बैठने की इच्छा लिए बैठे हैं। इंद्र का सिंहासन डोलने लगता है पुराणों में, वह तो प्रतीक है। वह यह बता रहा है कि ऋषि-मुनि वस्तुत: ऋषि-मुनि नहीं हैं। वे भी आकांक्षा कर रहे हैं स्वर्ग में सिंहासन की। और जहां आकांक्षा है, वहा प्रतिस्पर्धा है। और जो पहले से सिंहासन पर बैठा है वह जरूर घबडाएगा। अब तुम अगर राष्ट्रपति होना चाहो तो राष्ट्रपति घबडाएगा, कि ये आने लगे सज्जन, डरो! अब तुम अगर अप्सराओं की कामना करने लगे कि उर्वशी को भोगना है, तो इंद्र घबडाएगा। उसकी उर्वशी छीनने की चिंता में तुम लगे हो। वह तुम्हें डंवाएगा, डिगाएगा, आएगा।

पुराण की कथाएं अर्थपूर्ण हैं। वे इतना ही कह रही हैं कि ऋषि अभी ऋषि नहीं। अन्यथा इंद्र को क्या प्रतिस्पर्धा उससे होती? यह मुक्त होना ही नहीं चाहता था। यह तो त्याग का सौदा कर रहा है। यह जो संसार में नहीं पा सका, संसार छोड़कर पाने की कोशिश कर रहा है। पर इसकी आकांक्षा तो वही की वही है।

वासना बिना पके नहीं मरती। और जब पककर मरती है तभी मरती है। फिर पीछे दाग भी नहीं छोड़ जाती। तब तुम ऐसे निर्दोष निकलते हो, ऐसे ताजे, जैसे सुबह-सुबह अभी-अभी खिला हुआ फूल हो।

तो मैं तुमसे कहता हूं भागना मत। जीवन को जानना है, जीना है। मैं कोई चार्वाकवादी नहीं हूं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जीवन के पार कुछ भी नहीं है। मैं कह रहा हूं जीवन के पार कुछ है, लेकिन जीवन तो पार करो पहले। जीवन के पार जो है वह तभी दिखायी पड़ेगा जब जीवन से पार हो जाओगे। आधे से भाग गए, सीमा तक न पहुंचे और भाग गए, तो तुम जीवन में ही भटकते रहोगे। सीमा के पार ही अतिक्रमण संभव है।

तो मेरी दृष्टि भोग के माध्यम से त्याग तक जाने की है। और दूसरा कोई माध्यम

इतना कारगर नहीं है। इसलिए बुद्ध तो होते हैं, लेकिन कितने लोग उनके पीछे बुद्धत्व को उपलब्ध हो पाते हैं? ना के बराबर। क्योंकि दिशाएं बड़ी भिन्न-भिन्न हैं। तो महल छोड़कर भिखारी होते हैं। और दूसरा आदमी भिखारी ही था और बुद्ध के पीछे हो लेता है। उन दोनों के अनुभव अलग हैं। बुद्ध के त्याग में तो भोग का अनुभव छिपा है। भिखारी के त्याग में कुछ भी नहीं, भिक्षापात्र छोड़ रहा है। उसके पास कुछ त्याग को था भी नहीं। उसका त्याग धोखा है।

तो मैं तुमसे अतिरेक में जीने को कहता हूं। जीवन है जब तक उसे पूरा-पूरा जी लो। जीते ही तुम उससे मुक्त हो जाओगे।

अब इतनी पी जाती ली है कि अब पीने का कोई उपाय न रहा। जीवन को इतना पी डालो कि पीने का फिर कोई उपाय ही न रह जाए। पीकर ही तुम मुक्त होओ। लेकिन अगर तुम्हें बुद्ध की बात ठीक जमती हो, तो मजे से उस मार्ग पर चले जाओ। लेकिन ध्यान रखना अपना, कि क्या तुम्हारे पास बुद्ध जैसा जीवन का अनुभव है? भोग का ऐसा गहन अनुभव है?

तुम्हें पता है बुद्ध के जीवन की कहानी?

ज्योतिषियों ने कहा कि यह छोड़कर संन्यासी हो जाएगा। तो बाप चिंतित हुआ। शद्धोदन ने बड़े-बड़े ज्ञानियों से सलाह ली कि क्या करें?

निश्चित ही वे ज्ञानी भगोड़े होंगे। शास्त्रों में यह कहा नहीं है, यह मेरी दृष्टि है। बे ज्ञानी भगोड़े होंगे, क्योंकि अक्सर जानी भगोड़े होते हैं। त्यागी महात्माओं को बुला होगा। उनसे पूछा। वे कोई सम्राट न थे, जिन्होंने संसार जानकर छोड़ा था। उन्होंने जीवन को बेबसी में छोडा होगा, असहाय अवस्था में छोड़ा होगा। पा नहीं सके इसलिए छोड़ा होगा। अंगूर खट्टे थे, पहुंच नहीं सके, इसलिए। पहुंच जाते तो उन्‍होंने भी बड़ी चेष्टा की थी!

उन्होंने सलाह दी कि आप ऐसा करो, सब भोगों का इंतजाम कर दो। भोग में डूब जाएगा, संन्यासी अपने आप न होगा।

इससे मैं कहता हूं कि वे त्यागी रहे होंगे। अगर बुद्ध के बाप ने मुझसे पूछा होता तो मैं कहता कि भोग से इसको दूर रखो। स्त्रियों को पास मत आने दो। हां, फिल्म। दिखानी हो दिखा दो। पर्दे पर दिखायी पड़े, छू न सके स्त्री को। क्योंकि पर्दे से सपना नहीं मिटता, बनता है। स्त्री को पास मत आने देना। इसको सुख-सुविधा मैं मत डालो। गिट्टियां तुड़वाओ, सड़क पिटवाओ, मेहनत-मजदूरी करवाओ, इसको महल में मत टिकने दो। इसकी महल की आकांक्षा कभी न मरेगी। क्योंकि जिसको जाना नहीं, उसकी आकांक्षा होती है, मरती नहीं। यह कभी संन्यासी न होगा।

लेकिन त्यागी महात्माओं ने कहा….उन्होंने बेचारों ने अपने अनुभव से कहा। जो उन्हें नहीं मिला था, उन्होंने सोचा, अगर हमको मिलता-सुंदर स्त्रियां मिलती, महल मिलते-तो हम संन्यासी होते? उनका तर्क साफ है। संन्यासी वे इसलिए हुए कि न सुंदर स्त्रियां मिलीं, न महल मिले। वही इसके लिए भी जमा दो, यह भटक जाएगा उसी में। यह अपना अनुभव वे बता रहे हैं, कि हम भी भटक जाएं अगर इंतजाम अभी कोई कर दे। भीतर तो वही चाह रही होगी। मुझे पता नहीं कौन लोग थे वे? उनके नाम का भी कोई उल्लेख नहीं, लेकिन बात जाहिर है कि वे आदमी बीच से भाग गए होंगे, जीवन का अनुभव न रहा होगा।

बुद्ध के बाप ने उनकी मान ली, लड़का खोया। बना दिए महल चार। हर मौसम के लिए अलग। जितनी राज्य में सुंदर युवतियां थीं, सब इकट्ठी कर दीं। बुद्ध लड़कियों के बीच ही बड़े हुए। लेकिन ऊब गए। सुंदरतम स्त्रियां उनके पास थीं। उन्होंने सारे सपने तोड़ दिए।

सुंदरतम स्त्री भी तुम्हारे पास हो, दो दिन से ज्यादा थोड़े ही सुंदर मालूम पड़ती है। दो दिन के बाद सब स्त्रियां साधारण हो जाती हैं। स्त्री का सौंदर्य बच सकता है, अगर तुम्हें दूर रखा जाए। वह कामना में है, अनुभव में नहीं। कितनी ही सुंदर स्त्री हो, क्या करोगे! दो दिन के बाद साधारण हो जाती है। कोई पति अपनी पत्नी को देखता है? कितनी ही सुंदर हो, और कभी-कभी हैरान भी होता है कि दूसरे क्यों रास्ते पर रुक-रुककर मेरी स्त्री को देखने लगते हैं। क्योंकि उसे तो कुछ नहीं दिखायी पड़ता। दूसरों को दिखायी पड़ता है। दूसरे की पत्नी सदा ही सुंदर मालूम पड़ती-है। और कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि तुम्हारी सुंदर पत्नी तुम्हें सुंदर नहीं मालूम पड़ती, घर की नौकरानी साधारण तुम्हें सुंदर मालूम पड़ने लगती है। क्योंकि उसमें फासला है।

दूर रखो, चीजें सुंदर रहती हैं। दूर के ढोल सुहावने! पास आते ही सपने टूट जाते हैं। यथार्थ खुल जाता है। बुद्ध उन सारी सुंदर स्त्रियों को देखकर ऊब गए। परेशान हो गए। भागने का मन होने लगा। एक रात उठे, तो देखा सारी सुंदर स्त्रिया उनके आसपास पड़ी हैं। किसी के मुंह से लार बह रही है, किसी की आख में कीचड़ जमा है, किसी का मुंह खुला है और घर्राटा निकल रहा है, वे एकदम भागे वहा से। उन्होंने कहा कि इनके पीछे मैं दीवाना हुआ हूं!

कोई भी ऋषि-मुनि हो जाए ऐसी अवस्था में! धन था, स्त्रियां थीं, वैभव था, ऊब गए। दिखायी पड़ गया, इसमें कुछ भी नहीं है। एक बात साफ हो गयी कि रोज मौत करीब आ रही है। और यह सब व्यर्थ है। सत्य को खोजना जरूरी है। अमृत को खोजना जरूरी है।

तो बुद्ध तो इस कारण संन्यासी हुए। वे तो मेरे ही संन्यासी हैं। लेकिन बुद्ध से प्रभावित होकर जो संन्यासी हुए, वे मेरे संन्यासी नहीं हैं। उन्होंने बुद्ध की रौनक देखी, चमक देखी, प्रतिभा देखी, बुद्ध की शाति देखी; ईर्ष्या जगी, लोभ जगा, मन। में उनके भी हुआ-ऐसे ही शात हम भी हो जाएं। लेकिन उन्हें पता नहीं, इस शाति के पीछे बड़ा गहरा अनुभव है भोग का। एक बड़ा रेगिस्तान पार कर के आए हैं वे। एक बड़ा अनुभव का विस्तार है पीछे। और तुम जल्दबाजी नहीं कर सकते।

तुम, अगर तुम ठीक समझो तो जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह वही है जो बुद्ध के जीवन का सार है। मैं तुमसे वह नहीं कह रहा हूं जो बुद्ध कहते हैं। मैं तुमसे वह कह रहा हूं जो बुद्ध हैं।

इसलिए मैं कहता हूं, भागो मत। जहां हो, जो क्षण मिला है, उसे इतनी त्वरा से भोग लो कि तुम उसके आर-पार देखने में समर्थ हो जाओ। जीवन पारदर्शी हो जाए। बस वहीं से संन्यास की सुवास उठनी शुरू होती है। और तब भागने की भी कोई जरूरत नहीं है।

रवींद्रनाथ का एक गीत है, जिसमें बुद्ध वापस लौटते हैं, और यशोधरा उनसे है कि मैं सिर्फ एक ही सवाल तुमसे पूछने को रुकी हूं। बारह वर्ष तुम्हारी प्रतीक्षा की है, बस एक सवाल के लिए, कि तुमने जो जंगल में भागकर पाया, क्या तुम अब कह सकते हो कि यहीं रहते तो नहीं मिल सकता था? अब तो तुम्हें मिल गया। अब मुझे एक ही सवाल तुमसे पूछना है कि जो तुमने वहा पाया, क्या वह यहीं नहीं मिल सकता था? और रवींद्रनाथ ने कविता में बुद्ध को मौन रखा है। कुछ कहलवाया नहीं। कहें भी क्या? बात तो ठीक ही यशोधरा कह रही है, वह यहां भी मिल सकता था।

सत्य सब जगह है। समझ चाहिए। और समझ अनुभव का सार है। इसलिए मै तुम्हें अनुभव से तोड़ना नहीं चाहता। चाहता हूं कि तुम जितनी जल्दी अनुभव में उतर जाओ, जितने गहरे उतर जाओ, उतनी ही जल्दी अतिक्रमण का क्षण करीब आ जाए। संन्यास बहुत पास है। संसार का अनुभव तुम्हारा पूरा होना चाहिए। संन्यास ससार के विपरीत नहीं है। संन्यास संसार के पार है। विपरीत नहीं, आगे। जहां संसार समाप्त होता है, जहां संसार का मील का पत्थर आता है, जहां लिखा है-यहां समाप्त होती है सीमा-वहीं संन्यास शुरू होता है। लेकिन संसार पूरा करना ही होगा। अगर अभी पूरा न करोगे, फिर लौटकर आओगे।

बुद्ध को भी शायद तुमने सुना हो। पच्चीस सौ साल हो गए। तुम पच्चीस बार लौट चुके। तुम मुझे भी सुन रहे हो। अगर मेरी बात तुमने न गुनी, तुम फिर-फिर लौटकर आओगे। परमात्मा तुम्हें वापस इस स्कूल में भेजता ही रहेगा, जब तक तुम उत्तीर्ण ही न हो जाओ। इसलिए मैं कहता हूं जल्दी करो। भागने की नहीं, भोगने की। जागने की। अनुभव को निरीक्षण करने की। अगर ठीक से अनुभव किया जाए तो किसी अनुभव को दोहराने की जरूरत नहीं। एक ही बार अगर पूरे मन से जागकर कोई अनुभव कर लिया जाए, तुम उससे मुका हो जाओगे। क्योंकि फिर पुनरुक्ति

बुद्ध ने स्त्रियों को संन्यास देने से टालना चाहा। शंकर भी स्त्रियों को संन्यास देने के पक्ष में नहीं थे। संन्यास जीवन की स्त्रियों से ऐसी क्या विपरीतता है? क्या स्त्रियों से उसका कोई तालमेल नहीं है, या कम है? क्या उन्हें संन्यास लेने की जरूरत पुरुषों की अपेक्षा कम है?

पुरूष और स्त्री का मार्ग मूलत: अलग-अलग है। पुरुष का मार्ग ध्यान का है; स्त्री का मार्ग प्रेम का। पुरुष का मार्ग ज्ञान का है; स्त्री का मार्ग भक्ति का। उन दोनों की जीवन-चित्तदशा बड़ी भिन्न है, बड़ी विपरीत है। पुरुष को प्रेम लगता है बंधन; स्त्री को प्रेम लगता है मुक्ति। इसलिए पुरुष प्रेम भी करता है तो भी भागा-भागा, डरा-डरा कि कहीं बंध न जाएं। और स्त्री जब प्रेम करती है तो पूरा का पूरा बंध जाना चाहती है, क्योंकि बंधन में ही उसने मुक्ति जानी है। तो पुरुष की भाषा जो है वह है-कैसे छुटकारा हो? कैसे संसार से मुक्ति मिले? और स्त्री की जो खोज है वह है-कैसे वह डूब जाए पूरी-पूरी, कुछ भी पीछे न बचे?

तो संन्यास मूलतः पुरुषगत है। इसलिए बुद्ध भी झिझके। स्त्रियां प्रभाव में आ गयी-स्त्रियां जल्दी प्रभाव में आती हैं, क्योंकि उनके पास ज्यादा संवेदनशील हृदय है-वे मांगने लगीं कि हमें भी संन्यास दो। बुद्ध डरे। महावीर ने तो उनसे साफ कहा कि दे भी दूं, तो भी तुम्हारी मुक्ति इस जन्म में नहीं होगी, जब तक तुम पुरुष न हो जाओ। पुरुष-पर्याय से ही मुक्ति होगी।

कारण साफ है। महावीर का मार्ग भक्ति का नहीं है, और बुद्ध का मार्ग भी भक्ति का नहीं है। इसलिए अड़चन है। स्त्री के लिए उनके मार्ग पर कोई सुविधा नहीं है। और स्त्री जब भी मुक्ति को उपलब्ध हुई है तो वह मीरा की तरह नाचकर, प्रेम में परिपूर्ण डूबकर मुक्त हुई है। संसार से भागकर नहीं, संबंध से छूटकर नहीं, संबंध में पूरी तरह डूबकर। वह इतनी डूब गयी कि मिट गयी।

मिटने के दो उपाय हैं। या तो तुम भीतर की तरफ जाओ, अपने केंद्र की तरफ जाओ, और उस जगह पहुंच जाओ जहां तुम ही बचे। जहां तुम ही बचे और कोई न बचा, वहा तुम भी मिट जाओगे, क्योंकि मैं के बचने के लिए तू की जरूरत है। के बिना मैं नहीं बच सकता। अगर तू बिलकुल छूट गया-यही संन्यास है, बुद्ध का, महावीर का; मेरा नहीं। बुद्ध-महावीर का यही संन्यास है कि अगर तू बिलकुल मिट जाए तुम्हारे चित्त से तो मैं अपने आप गिर जाएगा; क्योंकि वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। तू के बिना मैं का कोई अर्थ नहीं रह जाता मैं गिर जाएगा, तुम शून्य को उपलब्ध हो जाओगे।

स्त्री का मार्ग दूसरा है। वह कहती है, मैं को इतना गिराओ कि तू ही बचे, प्रेमी ही बचे, प्रीतम ही बचे। और जब मैं बिलकुल गिर जाएगा और तू ही बचेगा, तो तू भी मिट जाएगा; क्योंकि तू भी अकेला नहीं बच सकता। मंजिल पर तो दोनों पहुंच जाते हैं-शून्य की, या पूर्ण की-मगर राह अलग है। स्त्री मैं को खोकर पहुंचती है। पुरुष तू को खोकर पहुंचता है। पहुंचते दोनों वहा हैं जहां न मैं बचता है, न तू बचता है।

इसलिए बुद्ध-महावीर शंकित थे, संदिग्ध थे-स्त्री को लाना? और उनका डर स्वाभाविक था। क्योंकि स्त्री आयी कि प्रेम आया। और प्रेम आया कि उनके पुरुष भिक्षु मुश्किल में पड़े। वह डर उनका स्वाभाविक था। वह डर यह था कि अगर स्त्री को मार्ग मिला और स्त्री संघ में सम्मिलित हुई, तो वे जो पुरुष भिक्षु हैं, वे आज नही कल स्त्री के प्रेम के जाल में गिरने शुरू हो जाएंगे। और वही हुआ भी। बुद्ध ने कहा था कि अगर स्त्रियों को मैं दीक्षा न देता तो पाच हजार साल मेरा धर्म चलता, अब पांच सौ साल चलेगा। पांच सौ साल भी मुश्किल से चला। चलना कहना ठीक नहीं है, लंगड़ाया, घिसटा। और जल्दी ही पुरुष अपने ध्यान को भूल गए।

पुरुष को उसके ध्यान से डिगाना आसान है। स्त्री को उसके प्रेम से डिगाना मुश्किल है।

अगर तुम मुझसे पूछते हो, तो मैं यह कहता हूं कि बुद्ध और महावीर ने यह स्वीकार कर लिया कि स्त्री बलशाली है, पुरुष कमजोर है। अगर स्त्री को दिया मार्ग अंदर आने का, तो उन्हें अपने पुरुष संन्यासियों पर भरोसा नही-वे खो जाएंगे। स्त्री का प्रेम प्रगाढ़ है। वह डुबा लेगी उनको। उनका ध्यान-व्यान ज्यादा देर न चलेगा। जल्दी ही उनके ध्यान में प्रेम की तरंगें उठने लगेंगी।

स्त्री बलशाली है। होना भी चाहिए। वह प्रकृति के ज्यादा अनुकूल है। पुरुष जरा दूर निकल गया है प्रकृति से-अपने अहंकार में। स्त्री अपने प्रेम में अभी भी पास है। इसलिए स्त्री को हम प्रकृति कहते हैं। पुरुष को पुरुष, स्त्री को प्रकृति। प्रकृति का डर था महावीर और बुद्ध दोनों को। उनके संन्यासियों का डावाडोल हो जाना निश्चित था।

लेकिन मैं भयभीत नहीं हूं; क्योंकि मैं कहता हूं स्त्रियां प्रेम के मार्ग से जाएं। और जिनका ध्यान डगमगा जाए, अच्छा ही है कि डगमगा जाए; क्योंकि ऐसा ध्यान भी दो कौड़ी का जो डगमगा जाता हो। वह डगमगा ही जाए वही अच्छा। जब डूबना ही है तो नौका में क्या डूबना, नदी में ही डूब जाना। मैं मानता हूं कि प्रेम स्त्री का तुम्हें घेरे और तुम्हारा ध्यान न डगमगाए तो कसौटी पर उतरा सही। और जो प्रेम से न डगमगाए ध्यान, वही ध्यान समाधि तक ले जाएगा। जो प्रेम से डगमगा जाए, उसे अभी समाधि वगैरह तक जाने का उपाय नहीं। वह भाग आया होगा, प्रेम से बचकर, प्रेम की पीड़ा से बचकर-प्रेम से डरकर भाग आया होगा।

इसलिए मेरे लिए कोई अड़चन नहीं है। मैंने पहला संन्यास स्त्री को ही दिया। ये महावीर और बुद्ध को कहने को कि सुनो, तुम घबड़ाते थे, हम पुरुष को पीछे देंगे।

पुरुष ध्यान करे, स्त्री प्रेम करे-क्या अड़चन है? स्त्री तुम्हारे पास प्रेम का पूरा। माहौल बना दे, वातावरण बना दे, तो भी तुम्हारे ध्यान की ली अडिग रह सकती है, कोई प्रयोजन नहीं है कंपने का। सच तो यह है कि जब प्रेम की हवा तुम्हारे चारो तरफ हो, तो ध्यान और गहरा हो जाना चाहिए। लेकिन अगर तुम अधकचरे भाग आए संसार से, तो डगमगाओगे। तो उनके लिए मेरे पास कोई जगह नहीं। उनको मैं कहता हूं तुम वापस जाओ।

प्रेम को मैं कसौटी बनाता हूँ ध्यान का, और ध्यान को मैं कसौटी बनाता हूं प्रेम की। पुरुष अगर ध्यान में हो, तो स्त्री कितना ही प्रेम करे, पुरुष डगमगाएगा नहीं। उसके निष्कंप ध्यान से ही करुणा उतरेगी स्त्री की तरफ, वासना नहीं। और वही करुणा तृप्त करती है। वासना किसी स्त्री को कभी तृप्त नहीं करती।

इसलिए तो कितनी ही वासना मिल जाए स्त्री बेचैन बनी रहती है। कुछ खोया-खोया लगता है।

मेरा जानना है कि स्त्री को जब तक परमात्मा ही प्रेमी की तरह न मिले, तब तक तृप्ति नहीं होती। और जब तुम किसी ध्यानी व्यक्ति के प्रेम में पड़ जाओ तो परमात्मा मिल गया।

तो ध्यान प्रेम को बढ़ाएगा। क्योंकि ध्यान तुम्हारे प्रेमी को दिव्य बना देता है। और प्रेम ध्यान को बढ़ाएगा, क्योंकि प्रेम जो तुम्हारे चारों तरफ एक परिवेश निर्मित करता है, उस परिवेश में ही ध्यान का अँकुरण हो सकता है।

इसलिए मैं ध्यान और प्रेम में कोई विरोध नहीं देखता। ध्यान और प्रेम में एक गहरा समन्वय देखता हूं। होना ही चाहिए। जब स्त्री और पुरुष में इतना गहरा संबंध है, तो ध्यान और प्रेम में भी इतना ही गहरा संबंध होना चाहिए। और जब स्त्री और

पुरुष से मिलकर एक जीवन पैदा होता है, एक बच्चा पैदा होता है, तो मेरी समझ है कि ध्यान और प्रेम के मिलने से ही पुनर्जीवन उपलब्ध होता है, तुम्हारा नव-जन्म होता है।

   भगवान श्री ओशो रजनीश के श्री मुख से !