Monday, February 4, 2013

Oh ! God -- You are Really Great !

यदि धर्म मूलतः आनन्द का स्त्रोत हो तो नास्तिक होने को कोई कारण नहीं रह जाता, क्यूंकि कोई भी मनुष्य धर्म को इनकार कर सकता है - आनन्द को कैसे अस्वीकार करेगा ? वास्तव में लोग संप्रदाय को धर्म समझ लेते हैं और नास्तिक आस्तिक होने ना होने की ख़ुशफ़हमी में पड़े रहते हैं ! मेरी धर्म की परीभाषा है - आनन्द ! सिर्फ आनन्द , अकारण आनन्द , जो किसी पर निर्भर न हो , पर जेसे की श्वास लेने के आनन्द से हम ताउम्र अनभिज्ञ रहते वैसे ही अन्य कई प्रकार हैं आनंद के भी , पर जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैंठ !


“ बुतों शाबाश तुमको है तरक्की इसको कहते हैं , न तरसे थे तो पत्थर थे जो तरसे तो खुदा निकले ! “

किसने लिखा मालूम नहीं , पर क्या खूब लिखा !
अगस्त्य

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